शिवसेना केस: असीम सरोदे बोले, अंतिम फैसला नए साल में आने की संभावना ज्यादा
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सुप्रीम कोर्ट में शिवसेना पार्टी और चुनाव चिन्ह पर सुनवाई चल रही है। वकील असीम सरोदे ने एक्स पर शिंदे गट के वकील की दलील पर सवाल उठाए और फैसले को लेकर अपना अंदाजा बताया।
शिवसेना पार्टी और उसके चुनाव चिन्ह को लेकर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई चल रही है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की तीन सदस्यीय बेंच यह मामला सुन रही है। ठाकरे गट की दलीलें पूरी हो चुकी हैं और अब शिंदे गट की तरफ से दलीलें दी जा रही हैं।
कल शिंदे गट के वकील ध्रुव मेहता ने कोर्ट में अपनी बात रखी। कोर्ट ने इससे पहले कहा था कि शिवसेना की सुनवाई अक्टूबर में ही पूरी हो जाएगी, लेकिन अक्टूबर में ऐसा नहीं हो पाया। इसी बीच जाने-माने वकील असीम सरोदे ने इस पर अपनी प्रतिक्रिया दी है और बताया है कि फैसला कब तक आ सकता है।
सरोदे ने यह बात एक्स पर लिखी। उन्होंने शिंदे गट के वकील ध्रुव मेहता की दलील का मजाक भी उड़ाया। सरोदे के मुताबिक सत्ता संघर्ष के मामले में कल सिर्फ 15 मिनट कामकाज हुआ। उनका कहना है कि शिंदे की तरफ से जो दलील दी गई, उसे हास्यास्पद ही कहा जाएगा, फिर भी ऐसी दलील रखने दी जा रही है, यह गंभीर बात है। उन्होंने सवाल किया, "क्या कामकाज को नियम में रखने की सुप्रीम कोर्ट की कोई जिम्मेदारी नहीं है?"
सरोदे ने अपनी पोस्ट में बताया कि कोर्ट में क्या कहा गया। उनके मुताबिक कहा गया कि सुभाष देसाई केस का फैसला सुनाते वक्त तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश धनंजय चंद्रचूड़ की बेंच ने विधायक अपात्रता का मामला तय करने का अधिकार विधानसभा अध्यक्ष को दिया था। इसलिए अध्यक्ष ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश और दसवीं अनुसूची के हिसाब से अपात्रता पर फैसला लिया। अगर उनके फैसले में कोई कमी है, तो आम तौर पर मामले को वापस अध्यक्ष के पास भेजना ठीक रहेगा। सरोदे ने इस दलील को बेहद हास्यास्पद बताया।
सरोदे ने आगे लिखा कि इसके बाद कहा गया कि तत्कालीन विधानसभा की मियाद ही खत्म हो चुकी है, इसलिए अपात्रता की मांग बेमतलब है। इस पर सरोदे ने तंज कसते हुए लिखा, "वाह! सब कुछ मजेदार चल रहा है।" उन्होंने यह भी कहा कि अंतिम फैसला नए साल में ही आने की संभावना ज्यादा है।
कल की दलील के बारे में बताया गया कि ध्रुव मेहता ने कोर्ट में कहा था कि विधानसभा चुनाव हो चुके हैं और विधानसभा की मियाद खत्म हो गई है। इसलिए उनके मुताबिक विधायकों को अपात्र करने की मांग बेमतलब है। मेहता ने यह दावा भी किया कि एकनाथ शिंदे ने भरत गोगावले को प्रतोद यानी व्हिप नियुक्त किया था और उनका जारी किया हुआ व्हिप सही था।
कल कोर्ट में सुनवाई 15 मिनट चली। ध्रुव मेहता ने कोर्ट में पहली बार दलील रखी। अब इस मामले पर दिवाली के बाद सुनवाई होगी। इसलिए यह अंदाजा लगाया जा रहा है कि फैसला दिसंबर के आखिर तक या नए साल में आ सकता है।
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