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रिपेयर कैफे: फेंकने से पहले मरम्मत की सोच, बेंगलुरु से पुणे तक फैली मुहिम

रिपेयर कैफे कलेक्टिव इंडिया लोगों को टूटी चीजें फेंकने की जगह ठीक करना सिखा रहा है।

रिपेयर कैफे: फेंकने से पहले मरम्मत की सोच, बेंगलुरु से पुणे तक फैली मुहिम तस्वीरें सत्यापित नहीं हैं

पुणे, 27 अक्टूबर 2026: आज के दौर में कोई सामान खराब हो जाए तो लोग अक्सर उसे ठीक कराने की जगह नया ले आते हैं। इसी आदत को बदलने के लिए एक समुदाय-आधारित मुहिम चल रही है। उसका संदेश सीधा है: कुछ भी फेंकने से पहले देख लीजिए कि वह ठीक हो सकता है या नहीं।

रिपेयर कैफे कलेक्टिव इंडिया में वॉलंटियर, पेशेवर मरम्मत करने वाले, शिक्षक, मेकर्स और स्थानीय लोग साथ आते हैं। मकसद है मरम्मत, दोबारा इस्तेमाल, रखरखाव और काम की चीजें सीखने को बढ़ावा देना। इसकी शुरुआत 2015 में रिपेयर कैफे बेंगलुरु के नाम से हुई थी और अब यह पूरे भारत में चल रही मरम्मत की पहलों को सहारा देने वाला बड़ा कलेक्टिव बन गया है।

रिपेयर कैफे बेंगलुरु की संस्थापक पूर्णा सरकार और सह-संस्थापक हिमाद्री दास के साथ पुणे की संस्था Erepair के संस्थापक बाबाजान सज्जन इस कोशिश से जुड़े हैं कि मरम्मत का ज्ञान ज्यादा लोगों तक पहुंचे और रोजमर्रा की चीजें ज्यादा दिन चलें। कलेक्टिव का मानना है कि मरम्मत सिर्फ चीज को चालू करना नहीं है। इससे यह भी समझ आता है कि चीज चलती कैसे है, कचरा कम होता है और इस काम के हुनर की कद्र बढ़ती है।

पूर्णा सरकार के मुताबिक पहल का तरीका ऐसी जगहें बनाना है जहां लोग रोजमर्रा की चीजें ठीक करना सीख सकें, बजाय इसके कि उन्हें तुरंत फेंक दें। रिपेयर कैफे असल में कम्युनिटी वर्कशॉप हैं। यहां लोग घर का टूटा सामान लाते हैं और वॉलंटियर व पेशेवर मरम्मत करने वालों के साथ मिलकर हल ढूंढते हैं। वर्कशॉप के हिसाब से इनमें इलेक्ट्रॉनिक सामान, कपड़े, साइकिल और दूसरी आम चीजें हो सकती हैं।

यहां जोर हिस्सेदारी और सीखने पर है, सिर्फ सामान थमा देने पर नहीं। खराबी क्या है और उसे कैसे ठीक किया जाए, यह समझ लेने से लोग आगे अपनी दूसरी चीजों की देखभाल भी कर सकते हैं। कलेक्टिव यह भी मानता है कि हर मरम्मत खुद नहीं की जा सकती। कुछ चीजों के लिए खास जानकारी या पेशेवर मदद चाहिए। उसका बड़ा मकसद लोगों को मरम्मत की संभावनाएं समझाना है, ताकि वे कुछ फेंकने से पहले समझदारी से फैसला लें।

रिपेयर कैफे बेंगलुरु स्कूलों, कैफे, गैराज, पार्क और दूसरी साझा जगहों पर वर्कशॉप कर चुका है और इसमें काफी हद तक वॉलंटियरों पर निर्भर रहा है। पहल के बताए आंकड़ों के मुताबिक 2023 तक उसने 50 से ज्यादा रिपेयर वर्कशॉप आयोजित की थीं। पहले की रिपोर्टिंग में भी दर्ज है कि 2019 तक करीब 40 पॉप-अप कार्यक्रमों से 4,500 किलो से ज्यादा सामग्री कचरा भराव स्थलों में जाने से बची थी।

ये आंकड़े दिखाते हैं कि सामुदायिक मरम्मत से कचरा घटाने में मदद मिल सकती है। चीज की उम्र बढ़ने से नई खरीद टलती है और नया सामान बनाने में लगने वाले संसाधन भी बच सकते हैं। हिमाद्री दास मरम्मत को मिलकर सीखने का अनुभव बनाने की इस व्यापक कोशिश से जुड़े हैं। असर सिर्फ ठीक हुई चीजों की गिनती तक नहीं है, लोग नए हुनर सीखते हैं और अनुभवी मरम्मत करने वालों से जुड़ते हैं।

बच्चों के लिए कलेक्टिव TinkerKinder नाम का शैक्षणिक कार्यक्रम चलाता है, जिसमें उन्हें मरम्मत, रखरखाव, टिंकरिंग और समस्या सुलझाने से रूबरू कराया जाता है। बच्चे औजारों को खुद इस्तेमाल करते हैं, समझते हैं कि रोजमर्रा की चीजें कैसे काम करती हैं और मुश्किल से निपटने का भरोसा पाते हैं। कलेक्टिव के शैक्षणिक नजरिए के मुताबिक टूटी चीज को बेकार मानने की जगह बच्चे उसे परखने और प्रयोग करने का मौका समझ सकते हैं।

भारत में मरम्मत की अर्थव्यवस्था पुरानी है, जिसे मोहल्ले के इलेक्ट्रीशियन, दर्जी, मोची, साइकिल मैकेनिक और अप्लायंस टेक्नीशियन जैसे हुनरमंद लोग संभालते हैं। लेकिन सही मिस्त्री ढूंढना कभी-कभी मुश्किल होता है, खासकर जब स्थानीय दुकानें आसानी से नजर नहीं आतीं। मरम्मत की मैपिंग और सामुदायिक पहलें इन सेवाओं को दिखाई देने लायक बना सकती हैं। पुणे की Erepair के संस्थापक बाबाजान सज्जन इसी तरह समुदायों और मरम्मत सेवाओं के बीच रिश्ते मजबूत करने की कलेक्टिव की कोशिशों से जुड़े हैं।

रिपेयर वॉक और मैपिंग से स्थानीय मरम्मत व्यवस्था का रिकॉर्ड बनाया जाता है, जबकि ऑनलाइन ग्रुप में लोग सलाह लेते-देते हैं। ट्रेनिंग कार्यक्रम और वर्कशॉप में पेशेवर मरम्मत करने वाले, वॉलंटियर और सीखने वाले साथ बैठते हैं। यानी मरम्मत सिर्फ पर्यावरण का मसला नहीं है, यह स्थानीय रोजगार को भी सहारा देती है।

जो शुरुआत रिपेयर कैफे बेंगलुरु से हुई, उसने हैदराबाद, मुंबई और चेन्नई जैसे शहरों में मरम्मत से जुड़ी गतिविधियों को प्रेरणा दी है। कलेक्टिव के सार्वजनिक संसाधनों में अहमदाबाद, दिल्ली और पुणे के समुदायों व गतिविधियों का भी जिक्र है। यह मॉडल स्थानीय जरूरत के हिसाब से ढल सकता है। कहीं इलेक्ट्रॉनिक्स और घरेलू उपकरणों पर जोर हो सकता है, तो कहीं कपड़े, साइकिल या घर के बुनियादी रखरखाव पर। किसी एक केंद्रीय जगह की जगह मौजूदा जगहों में वॉलंटियर, हुनरमंद लोग और सीखने के इच्छुक एक साथ आ सकते हैं।

मरम्मत के फायदे कचरा घटाने से आगे जाते हैं। चीजें ज्यादा दिन चलें तो घरों का गैरजरूरी खर्च बचता है, संसाधन बचते हैं और स्थानीय मरम्मत का काम चलता है। इसका एक सांस्कृतिक पहलू भी है: जब लोग पहली खराबी पर चीज बदलने के आदी हो जाते हैं, तो उसे संभालने का हुनर उनसे छूट जाता है। मरम्मत की ये पहलें जिज्ञासा, व्यावहारिक सीख और हुनरमंद काम की कद्र बढ़ाकर यही चलन बदलना चाहती हैं।

हर चीज की मरम्मत मुमकिन या किफायती नहीं होती और कुछ चीजें पेशेवर मदद के बिना ठीक करना असुरक्षित भी हो सकता है। फिर भी मरम्मत को ज्यादा दिखने वाला विकल्प बनाने से लोग फेंकने से पहले परख सकते हैं कि चीज ठीक हो सकती है या नहीं। साझा मरम्मत की जगहें समुदायों को जानकारी बांटने और मिलकर काम करने का मौका देती हैं।

रिपेयर कैफे कलेक्टिव इंडिया की लंबी सोच है कि मरम्मत रोजमर्रा की जिंदगी का सामान्य हिस्सा बने, जहां हर मोहल्ले में मरम्मत की जानकारी, हुनरमंद लोग और खुद करके सीखने के मौके हों। सरकार, दास, सज्जन और मरम्मत की वकालत करने वालों के बड़े नेटवर्क के लिए चुनौती यही है कि ऐसे समाज में मरम्मत को स्वाभाविक पसंद बनाया जाए, जहां नई चीज ले आना अक्सर ठीक कराने से आसान लगता है।

ठीक हुआ अप्लायंस, सिला हुआ कपड़ा या दोबारा चलने लायक बनी साइकिल छोटी उपलब्धि लग सकती है। लेकिन मिलकर ऐसे कदम कचरा घटा सकते हैं, स्थानीय मरम्मत अर्थव्यवस्था को सहारा दे सकते हैं और काम का ज्ञान बचाए रख सकते हैं। आखिर में यह मुहिम टूटी चीजें जोड़ने से कहीं बड़ी है। यह लोगों के अपने सामान से रिश्ते को बदलने की बात है। मरम्मत सिर्फ चीजें ठीक करना नहीं, देखभाल की संस्कृति बनाना है।

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