सीवेज से बदली मुला-मुठा की सूक्ष्मजीव दुनिया, बारिश के बाद भी हालत नहीं सुधरी
पुणे के आघारकर संशोधन संस्थान के अध्ययन में सामने आया कि शहर के सीवेज और प्रदूषण से मुला-मुठा नदी के सूक्ष्मजीवों की प्राकृतिक बनावट बदल गई है।
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पुणे शहर के सीवेज और प्रदूषण की वजह से मुला-मुठा नदी में रहने वाले सूक्ष्मजीवों की प्राकृतिक बनावट बदल रही है। बारिश के मौसम में नदी में बड़ा बहाव आने के बाद भी यह हालत पहले जैसी नहीं होती। यह बात पुणे के आघारकर संशोधन संस्थान के अध्ययन से सामने आई है। नदी के सूक्ष्म शैवाल का अध्ययन करते वक्त शोधकर्ताओं को यह नतीजा मिला। अध्ययन से साफ हुआ कि प्राकृतिक बहाव से प्रदूषक भले बह जाते हों, लेकिन शहरी प्रदूषण का असर नदी की जैव विविधता पर बना रहता है।
पहले के शोधों में दिखा था कि उष्णकटिबंधीय नदियों में मौसमी बाढ़ आने से प्रदूषक बह जाते हैं और सूक्ष्मजीवों की प्रजातियों का प्राकृतिक मिश्रण फिर से कायम हो जाता है। मुला-मुठा के मामले में इस अध्ययन ने दिखाया कि बारिश के बड़े बहाव का असर सीमित रहता है। बाढ़ की हालत में सूक्ष्मजीवों की बनावट कुछ समय के लिए बदलती जरूर है, लेकिन कौन-सी प्रजातियां टिकेंगी, यह प्रदूषण का स्तर तय करता है।
शोधकर्ता प्रत्याशा नायक और डॉ. बालासुब्रमनियन कार्थिक ने 2022 और 2023, इन दो सालों में नदी के उद्गम क्षेत्र से लेकर शहरी और औद्योगिक इलाके तक 17 जगहों से नमूने जमा किए। इनमें पानी के नमूने भी थे और पत्थरों पर जमी जैविक परत के भी। इन नमूनों के आधार पर उन्होंने डायटम्स का अध्ययन किया, जो एक कोशिका वाले सूक्ष्म शैवाल हैं।
डायटम्स की कोशिका के चारों ओर सिलिका का खोल होता है। ये सूक्ष्मजीव पर्यावरण के बदलावों के प्रति संवेदनशील होते हैं, इसलिए पानी की गुणवत्ता जांचने में इनका इस्तेमाल किया जाता है। यही वजह है कि नदी के प्रदूषण का पारिस्थितिकी तंत्र पर क्या असर पड़ रहा है, यह समझने के लिए डायटम्स का अध्ययन अहम माना जाता है।
अध्ययन में पाया गया कि नदी की किसी एक जगह पर मिलने वाले डायटम्स की प्रजातियों की कुल विविधता अलग-अलग मौसमों में कमोबेश स्थिर रहती है। लेकिन नदी जब उद्गम क्षेत्र से शहरी इलाके की ओर बढ़ती है, तो प्रजातियों की बनावट में बड़े बदलाव दिखते हैं। साफ पानी और ज्यादा घुली ऑक्सीजन वाले उद्गम के आसपास पश्चिमी घाट की स्थानीय प्रजातियां मिलीं। शहरी इलाके में सीवेज और पोषक तत्व बढ़ने से इन संवेदनशील स्थानीय प्रजातियों की तादाद घट गई। उनकी जगह प्रदूषण सह सकने वाली प्रजातियां बढ़ती दिखीं।
शोध में यह भी साफ हुआ कि सूक्ष्मजीवों की बनावट में बदलाव के पीछे पानी की विद्युत चालकता और घुली ऑक्सीजन की मात्रा मुख्य रासायनिक कारण हैं। पानी में घुले लवण बढ़ें तो उसकी विद्युत चालकता बढ़ सकती है। सीवेज से पानी में ऑक्सीजन की मात्रा भी प्रभावित होती है। नतीजतन पर्यावरण के बदलावों के प्रति संवेदनशील स्थानीय प्रजातियों के अस्तित्व पर असर पड़ सकता है।
नदी को बचाने के लिए सिर्फ प्राकृतिक बहाव कायम रखना काफी नहीं है। शहरी सीवेज का ठीक से ट्रीटमेंट करना और नदी में छोड़े जाने वाले प्रदूषकों पर काबू रखना जरूरी है। साथ ही पानी की गुणवत्ता के मानकों को सख्ती से लागू करना भी अहम है।
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