पुणे पदवीधर में हर्षदा देशमुख-जाधव जीतीं, भाजपा को स्मिता जाधव से अपेक्षित नतीजा नहीं मिला
सत्ता, संगठन और कोल्हापुर के असरदार घराने का साथ होने के बाद भी पुणे पदवीधर सीट भाजपा के हाथ नहीं आई। नतीजे के बाद उम्मीदवार चयन, नाराजगी और मतगणना पर सवाल उठे हैं।
पुणे पदवीधर निर्वाचन क्षेत्र में भाजपा को वह कामयाबी नहीं मिली जिसकी उसे उम्मीद थी। सत्ता, संगठन, एक असरदार राजनीतिक घराने का समर्थन और जीत के लिए पूरी ताकत झोंकने के बावजूद नतीजा उसके पक्ष में नहीं गया। राष्ट्रवादी कांग्रेस के शरदचंद्र पवार पक्ष की हर्षदा देशमुख-जाधव ने यह चुनाव जीत लिया।
भाजपा 2020 में यह सीट गंवा चुकी थी और उसे वापस लेना चाहती थी। इसके लिए पार्टी ने कोल्हापुर के एक असरदार घराने की स्मिता जाधव को ऐन वक्त पर पार्टी में शामिल किया और उम्मीदवारी दे दी। लेकिन इस अचानक चले गए दांव का वैसा असर नहीं हुआ जैसा सोचा गया था। नतीजे के बाद उम्मीदवार चयन की राजनीति, पार्टी के भीतर की नाराजगी और विपक्ष की संगठन ताकत फिर चर्चा में हैं। सबसे बड़ा सवाल यही है कि असरदार सरनेम और सत्ता की ताकत के बावजूद भाजपा का हिसाब कहां गड़बड़ाया।
स्मिता जाधव का रिश्ता कांग्रेस नेता सतेज उर्फ बंटी पाटील से है। इसलिए ऐसा हो सकता था कि भाजपा को उम्मीद रही हो कि कोल्हापुर के राजनीतिक समीकरणों का फायदा मिलेगा। मगर कांग्रेस ने महाविकास अघाड़ी का धर्म निभाया और हर्षदा देशमुख-जाधव के समर्थन में खड़ी रही। नतीजे से दिखा कि निजी रिश्तों के ऊपर राजनीतिक प्रतिबद्धता भारी पड़ी।
हर्षदा देशमुख-जाधव को शरद पवार की अगुवाई और महाविकास अघाड़ी के तालमेल का फायदा मिला। प्रभाकर देशमुख की बेटी होने के नाते पुणे, सातारा और सांगली इलाके में उनकी पहचान और संपर्क भी काम आए। उद्धव ठाकरे की शिवसेना के सुनील मोदी भी मैदान में थे, फिर भी वोटों के बंटवारे का जो फायदा भाजपा को चाहिए था, वह नहीं मिला। नतीजों से साफ हुआ कि महाविकास अघाड़ी के घटक दलों ने स्थानीय समीकरण देखकर जो प्लानिंग की और बूथ स्तर पर जो तालमेल बिठाया, वह भाजपा के मुकाबले ज्यादा असरदार रहा।
यह निर्वाचन क्षेत्र पुणे, सातारा, सांगली, कोल्हापुर और सोलापुर, इन पांच जिलों में फैला है। इसमें 47 उम्मीदवार मैदान में थे, लेकिन असली मुकाबला स्मिता जाधव और हर्षदा देशमुख-जाधव के बीच ही रहा। चर्चा थी कि मौजूदा विधायक अरुण लाड के बेटे शरद लाड और अजित पवार गुट के नेता भैय्या माने उम्मीदवारी चाहते थे।
आखिर में टिकट स्मिता जाधव को मिला। इससे सवाल उठा कि क्या स्थानीय दावेदारों के समर्थक नाराज हो गए। भैय्या माने ने निर्दलीय पर्चा भरा था और बाद में नाम वापस ले लिया था। दावेदारों के समर्थकों ने असल प्रचार में कितना हिस्सा लिया, इसका जवाब भाजपा के अपने आत्मपरीक्षण से ही मिल सकता है।
हार के बाद मतगणना को लेकर उठे विवाद समेत संगठन के स्तर के कारणों की समीक्षा जरूरी हो गई है। गिनती के दौरान कुछ मतपेटियों की सील पर आपत्ति दर्ज कराई गई, जिससे चुनाव प्रक्रिया पर सवाल उठे। इन आपत्तियों पर गौर करके संबंधित बातों की जांच होनी चाहिए। लेकिन हार का विश्लेषण सिर्फ मतगणना तक सीमित रखना ठीक नहीं होगा।
उम्मीदवार का चयन, स्थानीय स्तर पर संगठन की बनावट, पार्टी के दावेदारों की नाराजगी और कार्यकर्ताओं की असल भागीदारी, इन सबकी भी गहराई से समीक्षा करनी पड़ेगी। खासकर यह देखना होगा कि निर्वाचन क्षेत्र में बूथ स्तर की मशीनरी कितनी असरदार तरीके से काम कर रही थी, पार्टी का संदेश मतदाताओं तक कितना पहुंचा और स्थानीय नेताओं व कार्यकर्ताओं ने प्रचार में कितनी सक्रिय भूमिका निभाई।
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