आईआईएसईआर पुणे की लाइब्रेरी से उमर खालिद की किताब हटी, बोर्ड चेयरमैन ने कार्रवाई की बात कही
सोशल मीडिया पर हंगामे के बाद आईआईएसईआर पुणे ने जेल में बंद उमर खालिद की किताब अपनी लाइब्रेरी से हटा ली।
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पुणे, 25 अक्टूबर 2026: भारतीय विज्ञान शिक्षा एवं अनुसंधान संस्थान (IISER) पुणे ने अपनी लाइब्रेरी से जेल में बंद कार्यकर्ता उमर खालिद की किताब की एक कॉपी हटा दी है। किताब लाइब्रेरी में जोड़े जाने पर सोशल मीडिया पर काफी आलोचना हुई थी, उसके बाद यह कदम उठाया गया।
किताब का नाम "Fractured Communities: Adivasi Histories and the Politics of Power" है और इसे Juggernaut ने छापा है। यह खालिद के 2018 के पीएचडी शोध-प्रबंध पर आधारित है, जो उन्होंने जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी के सेंटर फॉर हिस्टोरिकल स्टडीज़ से किया था। इस शोध में आज के झारखंड के सिंहभूम इलाके के आदिवासी समुदायों का औपनिवेशिक दौर और उसके बाद का इतिहास देखा गया है।
खालिद सितंबर 2020 से न्यायिक हिरासत में हैं। उन पर 2020 के उत्तर-पूर्व दिल्ली दंगों के मामले में गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) कानून, यानी UAPA, और उससे जुड़ी धाराओं में केस है। उन्हें अब तक दोषी नहीं ठहराया गया है।
शनिवार को एक सोशल मीडिया पोस्ट वायरल हुई, जिसमें बताया गया था कि यह किताब केंद्र सरकार से पैसा पाने वाले इस विज्ञान संस्थान की लाइब्रेरी में रखी गई है। इस पर तीखी प्रतिक्रियाएं आईं। आलोचकों ने सवाल उठाया कि राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े गंभीर आरोपों का सामना कर रहे शख्स की किताब एक नामी विज्ञान शोध संस्थान में क्यों रखी गई।
आईआईएसईआर पुणे के बोर्ड ऑफ गवर्नर्स के इंचार्ज चेयरमैन मादाभूषी मदन गोपाल ने X पर जवाब दिया कि संस्थान ने फौरन कदम उठाया। उन्होंने लिखा, "As incharge Chairman, BoG, IISER Pune, I am shocked to know this this is retracted last night & action is initiated on those who played this mischief. I assure such things will not happen again in IISER Pune. Prof. Sunil Bhagwat Director has taken immediately steps we need to be alert."
इसके बाद गोपाल ने बताया कि बोर्ड ऑफ गवर्नर्स का काम फाइनेंस कमेटी और बोर्ड की बैठकों को देखना है, जबकि रोज़ का प्रशासन और पढ़ाई-लिखाई से जुड़े मामले डायरेक्टर संभालते हैं।
उन्होंने यह भी लिखा, "Unfortunately mischief happened & corrected immediately." साथ ही कहा कि संस्थान "aware and alert" है और "suitable remedial measures" लिए जाने चाहिए।
बताया गया है कि संस्थान के डायरेक्टर प्रो. सुनील भागवत ने फौरन सुधार के कदम उठाए हैं। संस्थान के आधिकारिक सोशल मीडिया हैंडल से अब तक कोई विस्तृत आधिकारिक बयान जारी नहीं हुआ है।
इस मामले से अकादमिक आज़ादी, सरकारी पैसे से चलने वाले संस्थानों में लाइब्रेरी के लिए किताबें खरीदने की नीति, और विज्ञान कैंपस में राजनीतिक तौर पर विवादित सामग्री की मौजूदगी पर बहस फिर छिड़ गई है। कुछ पूर्व छात्रों और टिप्पणीकारों ने लाइब्रेरी कमेटी और किताब की सिफारिश करने वाले फैकल्टी की जांच की मांग की। वहीं कुछ और लोगों ने कहा कि किताब पर पाबंदी नहीं है और वह बाज़ार में मिलती है।
खालिद के शोध-प्रबंध की इतिहासकारों ने पहले भी तारीफ की है। रामचंद्र गुहा ने इसे किसी भारतीय विद्वान का पढ़ा हुआ सबसे बेहतरीन डॉक्टरेट शोध बताया था। यह काम औपनिवेशिक शासन, समुदायों के ढांचे और राज्य व आदिवासियों के रिश्तों की अभिलेखागार-आधारित रिसर्च पर टिका है, आज की राजनीति पर नहीं।
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