पुणे के रंगमंच पर नए प्रयोग: 24 घंटे में नाटक तैयार, दर्शक भी बन रहे हिस्सा
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पुणे के रंगकर्मी नाटक की सोच से लेकर मंच पर पेशकश तक नए तरीके आज़मा रहे हैं। दर्शकों को भी नाटक का हिस्सा बनाया जा रहा है।
पुणे की रंगभूमि पर इन दिनों पुराने ढर्रे से हटकर नए प्रयोग हो रहे हैं। तय मंच, पर्दा, नेपथ्य और कलाकारों की एक्टिंग वाली पारंपरिक चौखट से बाहर निकलकर रंगकर्मी नाटक पेश करने के नए तरीके ढूंढ रहे हैं। नाटक की कल्पना तैयार करने से लेकर दर्शकों को प्रयोग का हिस्सा बनाने तक कई अलग कोशिशें चल रही हैं। इससे नाटक देखने का अनुभव ही नहीं, नाटक बनाने की प्रक्रिया भी नई हो रही है।
इसकी एक मिसाल इसी साल अप्रैल में पुणे में हुआ 'नाटक एक्सप्रेस' है। यह 24 घंटे का नाट्य प्रयोग था। इसमें 60 कलाकार, 12 निर्देशक और 12 नाटककार शामिल हुए। चिट्ठी निकालकर टीमें बनाई गईं और हर टीम को दृश्य और ध्वनि से जुड़े संकेत दिए गए। इन्हीं के आधार पर स्क्रिप्ट लिखना, रिहर्सल करना और 10 से 15 मिनट की एकांकिका पेश करना, यही इस प्रयोग की रचना थी। कम समय में सब मिलकर नाटक बनाएं, यह एक अलग तरह की कोशिश रही।
दूसरी तरफ कलाकारों और दर्शकों के बीच की दूरी घटाने पर भी ज़ोर दिया जा रहा है। पारंपरिक मंच की जगह गोल या खुली जगह में प्रस्तुति हो रही है। कलाकार दर्शकों के बीच घूमते हैं और बातचीत के ज़रिए दर्शक भी हिस्सा लेते हैं। 'फोर हॉर्समेन ऑफ नेम, फेम, पेन एंड डेथ' नाटक में गोल मंच पर ग्रुप काउंसलिंग के रूप में मानसिक स्वास्थ्य का विषय उठाया गया था।
इन प्रयोगों के साथ पुणे में श्रीराम लागू रंग-अवकाश जैसे लचीली बनावट वाले मंच पर भी ज़ोर दिया जा रहा है। धायरी के 'मुक्त थिएटर' जैसी नई जगहों की वजह से प्रायोगिक नाटकों को शहर के मध्य हिस्से से बाहर भी मंच मिल रहा है। अलग सोच, पेशकश का नया तरीका और दर्शकों से सीधी बातचीत के चलते पुणे की रंगभूमि सिर्फ मनोरंजन का माध्यम नहीं रही, वह नई रचना का प्रयोग क्षेत्र बन रही है।
कलाकार शंतनू गायकवाड़ ने कहा, "रंगभूमि पर अभी पेश करने के कई नए तरीके इस्तेमाल हो रहे हैं। पहले कलाकार और दर्शक के बीच एक दूरी होती थी, लेकिन अब दर्शकों से सीधे बात करने के प्रयोग हो रहे हैं। खुली जगह में प्रस्तुति, अलग नेपथ्य और दर्शकों की भागीदारी से हम कलाकारों को भी नए सिरे से सोचने का मौका मिलता है।"
लेखक और कलाकार जीवन आघाव ने कहा, "आज के दर्शकों को अलग विषय और अलग ढंग से पेश किए गए नाटक देखना पसंद है। इसलिए नाटक लिखते वक्त सिर्फ संवादों पर निर्भर नहीं रह सकते। ध्वनि, रोशनी, संगीत और पेशकश की संभावनाओं का भी ध्यान रखना पड़ता है। प्रयोगशील रंगभूमि की वजह से नए लेखकों को विषय रखने की आज़ादी मिल रही है।"
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