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पिंपरी-चिंचवड में कचरा जागरूकता अभियान का खर्च 20.49 करोड़ से बढ़कर 108.18 करोड़ हुआ

पिंपरी-चिंचवड महानगरपालिका के गीले-सूखे कचरे के जागरूकता अभियान का ठेका बार-बार बढ़ाया गया और खर्च 108.18 करोड़ रुपये तक पहुंच गया।

पिंपरी-चिंचवड में कचरा जागरूकता अभियान का खर्च 20.49 करोड़ से बढ़कर 108.18 करोड़ हुआ तस्वीरें सत्यापित नहीं हैं

पिंपरी-चिंचवड महानगरपालिका (PCMC) का कचरा अलग-अलग करने का जागरूकता अभियान अब सवालों के घेरे में है। टेंडर की शुरुआती कीमत 20.49 करोड़ रुपये थी, लेकिन बार-बार एक्सटेंशन देने से खर्च 108.18 करोड़ रुपये तक पहुंच गया है। यह अभियान इंदौर के कचरा प्रबंधन मॉडल पर बना था और इसका मकसद लोगों को गीला और सूखा कचरा अलग करने के लिए तैयार करना था।

सवाल इस बात पर उठ रहे हैं कि इतने समय तक वही एजेंसियां क्यों काम कर रही हैं, नया टेंडर निकालने में देरी क्यों हुई और जमीन पर इस अभियान का असर कितना है।

निगम के स्वास्थ्य विभाग ने अक्टूबर 2021 में गीले-सूखे कचरे को अलग करवाने के लिए टेंडर प्रक्रिया शुरू की थी। इंदौर और पुणे की निजी एजेंसियों को आठ वार्डों में काम सौंपा गया। मूल ठेके की कीमत 20,49,50,920 रुपये थी। काम बेसिक्स म्युनिसिपल वेस्ट वेंचर्स, जनवाणी, D'Vine और ऑल इंडिया इंस्टिट्यूट ऑफ लोकल सेल्फ-गवर्नमेंट को मिला। नवंबर 2022 में मूल ठेके की अवधि खत्म हो गई।

उम्मीद थी कि इसके बाद नया टेंडर निकलेगा, मगर प्रशासन मौजूदा ठेकों को ही बढ़ाता रहा। एजेंसियों को इस शर्त पर चलने दिया गया कि अच्छा प्रदर्शन रहा तो आगे भी एक्सटेंशन पर विचार होगा।

सूत्रों के मुताबिक ठेके नौ बार बढ़ाए जा चुके हैं और अब दसवें एक्सटेंशन पर काम चल रहा है। कुल खर्च 108.18 करोड़ रुपये हो चुका है। बीच में नया टेंडर शुरू हुआ था, पर आपत्तियां उठने के बाद उसे वापस ले लिया गया।

यह योजना 2021 में तत्कालीन महानगरपालिका आयुक्त राजेश पाटील ने बनाई थी। वे कचरा अलग करवाने के इंदौर के तरीके के कुछ हिस्से यहां लागू करना चाहते थे। शुरुआती दो साल के लिए चार निजी एजेंसियां रखी गईं, ताकि लोगों को गीला, सूखा और खतरनाक कचरा अलग करना सिखाया जाए। आलोचकों का कहना है कि बार-बार एक्सटेंशन से यही मॉडल सालों से चल रहा है और इसके असर का कोई साफ सार्वजनिक आकलन नहीं हुआ।

प्रशासक के कार्यकाल के बाद जब निर्वाचित पार्षद लौट आए, तब भी एक्सटेंशन चलते रहे। इससे यह सवाल खड़ा हुआ है कि निगम टेंडर प्रक्रिया पूरी करके लंबी अवधि की व्यवस्था क्यों नहीं बना पाया।

निगम हर घर के हिसाब से एजेंसियों को हर महीने 24.15 रुपये देता है। इतने खर्च को देखते हुए प्रशासन से अपेक्षा है कि वह अभियान की पहुंच और नतीजों का साफ हिसाब दे। इसमें कितने घरों तक पहुंचे, कौन-सी जागरूकता गतिविधियां और कितनी बार हुईं, लोगों की कचरा अलग करने की आदत में क्या बदलाव आया और शहर की कचरा व्यवस्था पर कितना नापा जा सकने वाला असर पड़ा, यह सब शामिल है। इसके बिना यह तय करना मुश्किल है कि खर्च के हिसाब से नतीजे मिले या नहीं।

स्वास्थ्य विभाग के उपायुक्त प्रदीप ठेंगल ने कहा कि जागरूकता कार्यक्रम जरूरी है और नया टेंडर पूरा न होने की वजह से मौजूदा एजेंसियों को एक्सटेंशन दिए गए। ठेंगल ने कहा, "गीले और सूखे कचरे को अलग करने के बारे में नागरिकों में जागरूकता फैलाना जरूरी है। नया टेंडर पूरा नहीं हो पाया, इसलिए एजेंसियों को समय-समय पर एक्सटेंशन दिए गए। कचरा संकलन और परिवहन का नया टेंडर जारी होगा, तो उसमें जागरूकता का हिस्सा भी शामिल किया जाएगा। फिलहाल दिए गए एक्सटेंशन के तहत काम चल रहा है।"

एक और आरोप यह है कि लोग आम तौर पर कचरा गाड़ी को देने से पहले गीला और सूखा अलग करके देते हैं और ठेकेदारों के कर्मचारियों से उम्मीद है कि वे इसे अलग ही रखें। लेकिन आरोप हैं कि लोगों का अलग किया कचरा कभी-कभी गाड़ी के उसी बड़े कंटेनर में मिला दिया जाता है। अगर यह चलन बड़े पैमाने पर है, तो घर-घर कचरा अलग करवाने की पूरी कोशिश का मकसद ही कमजोर पड़ जाता है।

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