पुणे स्टेशन पर लेट ट्रेनों से प्लेटफॉर्म फुल, यात्री परेशान
लंबी दूरी की कई ट्रेनें छह-सात घंटे देरी से पुणे पहुंच रही हैं, जिससे दूसरी गाड़ियों की आवाजाही पर असर पड़ रहा है।
तस्वीरें सत्यापित नहीं हैं
पुणे रेलवे स्टेशन से सफर करने वाले यात्रियों को इन दिनों देरी की मार झेलनी पड़ रही है। लंबी दूरी की कई ट्रेनें छह से सात घंटे लेट होकर पुणे पहुंच रही हैं। इसका असर एक कड़ी की तरह फैल रहा है और गाड़ियों के आने के साथ-साथ जाने का वक्त भी बिगड़ रहा है।
भीड़ सबसे ज्यादा स्टेशन के सबसे व्यस्त समय में होती है, यानी शाम 5 बजे से 7 बजे के बीच और फिर रात 10 बजे से आधी रात तक। लेट चल रही ट्रेनें अक्सर इन्हीं घंटों में पहुंचती हैं। नतीजा यह कि जिन गाड़ियों को तय समय पर स्टेशन में आना है, उनके लिए जगह बहुत कम बचती है।
पुणे इनमें से कई ट्रेनों का आखिरी स्टेशन है। इसलिए यहां पहुंचने के बाद ट्रेन को प्लेटफॉर्म पर रुकना पड़ता है, ताकि यात्री उतर सकें, बाकी कामकाजी प्रक्रिया पूरी हो और तकनीकी काम निपटाया जा सके। एक ट्रेन करीब 30 से 40 मिनट तक प्लेटफॉर्म घेरे रहती है। व्यस्त घंटों में इससे प्लेटफॉर्म मिलना और मुश्किल हो जाता है।
जब प्लेटफॉर्म खाली नहीं होते, तो देर से आने वाली ट्रेनों को होम सिग्नल पर या रेलवे सेक्शन के अंदर ही खड़े रहकर इंतजार करना पड़ सकता है, जब तक कोई प्लेटफॉर्म फ्री न हो जाए। इस रुकावट का असर पूरे टाइमटेबल पर पड़ता है, और पुणे से रवाना होने वाली गाड़ियां भी इससे अछूती नहीं रहतीं।
जिन ट्रेनों का नाम इस भीड़ के सिलसिले में लिया जा रहा है, उनमें हावड़ा-पुणे आजाद हिंद एक्सप्रेस, जोधपुर-पुणे एक्सप्रेस, जम्मू तवी-पुणे झेलम एक्सप्रेस, हावड़ा-पुणे दुरंतो एक्सप्रेस और चेन्नई-पुणे एक्सप्रेस शामिल हैं।
यह हालत बताती है कि जब लंबी दूरी की गाड़ियां अपने तय वक्त से बहुत देर से पहुंचती हैं, तो प्लेटफॉर्म संभालना कितना मुश्किल हो जाता है। यात्रियों के लिए इसका मतलब है ज्यादा इंतजार, आगे का सफर बिगड़ जाना और गाड़ी कब छूटेगी इसका कोई भरोसा न होना।
लेट ट्रेनों के पहुंचने और प्लेटफॉर्म देने के बीच बेहतर तालमेल बैठाया जाए, तो दूसरी गाड़ियों पर पड़ने वाला असर घट सकता है। खासकर पुणे स्टेशन के शाम और देर रात के रश वाले घंटों में यह और जरूरी है।
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