अजित पवार के बिना पहली दिवाली: राजेंद्र पवार ने बचपन की यादों पर भावुक पोस्ट लिखी
अजित पवार के निधन के बाद पवार परिवार की पहली दिवाली पर राजेंद्र पवार ने सोशल मीडिया पर बचपन की साझा दिवाली को याद किया और एक पुराना वीडियो भी डाला।
बारामती: उपमुख्यमंत्री अजित पवार का निधन जनवरी महीने में हुआ था। उनके अचानक चले जाने से पूरा महाराष्ट्र शोक में डूब गया था। अब उनके बिना यह पवार परिवार की पहली दिवाली है, और इसी मौके पर परिवार के भीतर से राजेंद्र पवार की भावुक प्रतिक्रिया सामने आई है। राजेंद्र पवार एग्रीकल्चरल डेवलपमेंट ट्रस्ट के प्रमुख हैं।
इससे पहले शरद पवार मीडिया के सामने साफ कह चुके थे कि इस साल उनके यहां दिवाली नहीं मनेगी। उन्होंने कहा था कि पहली बार अजित पवार के बिना दिवाली का त्योहार आ रहा है और परिवार को बड़ा दुख है, इसलिए पवार परिवार इस बार दिवाली नहीं मनाएगा।
पवार परिवार की दिवाली राज्य की राजनीति में हमेशा चर्चा और आकर्षण का विषय रही है। हर साल बारामती के गोविंदबाग में दिवाली पाड़वा मनाया जाता है, जिसमें शरद पवार से मिलने के लिए राज्य भर से कार्यकर्ता, पदाधिकारी और नेता आते हैं। अजित पवार के असमय निधन की वजह से इस बार इस परंपरा में रुकावट आएगी।
राजेंद्र पवार ने सोशल मीडिया पर पोस्ट लिखी और एक पुराना वीडियो भी साझा किया। पोस्ट में उन्होंने लिखा, "अजित के जाने के बाद आज पहली बार दिवाली सूनी-सूनी लग रही है। बचपन से साथ मनाई गई दिवालियां बहुत अपनेपन की थीं। तासेब (अनंतराव) पटाखे लाते और सबको बराबर बांट देते थे। पटाखे दिन भर चलें, इसलिए हम उन्हें अंधेरी कोठरी में शेल्फ पर रखी बोरी में छिपा देते थे, ताकि किसी को मिल न जाएं।"
उन्होंने आगे लिखा, "उस समय नया पैराशूट उड़ता तो उसे पकड़ने के लिए हम झाड़-झंखाड़ के बीच दौड़ते थे। आधे जले पटाखों की बारूद इकट्ठा करके अगले दिन जलाते थे। दादी के डर से हमारा पूरा घर सीधा चलता था। तू आज होता तो डर और प्यार कुछ और ही तरह का होता। दिवाली पर एनडी पाटील (बुआ की वजह से मामा) आते तो घर बातों से भर जाता। वे दूसरी पार्टी के थे और अपने निजी उसूलों वाले थे, फिर भी हर उम्र के आदमी से उनकी पटती थी। पार्टी और अपने उसूल अलग रखकर रिश्ते निभाने चाहिए, यह मैंने सीखा।"
पोस्ट में बचपन की रोज़मर्रा की तंगी भी याद की गई है। राजेंद्र पवार ने लिखा, "उन दिनों इतने मेहमानों के लिए टोकरी वाला एक ही शौचालय था। बच्चों को टीन की आड़ के पीछे कतार में बैठना पड़ता, आगे-पीछे खिसकना पड़ता। इस अनुभव से आगे चलकर किसी के भी साथ निभाना हमारे लिए आसान हो गया। घर के पीछे के कुएं से आधी आमराई पानी भरती थी और सुबह से कावड़ की चूं-चूं की आवाज़ चलती रहती थी। सीढ़ी पर बैठकर ईंट के टुकड़े से या राख से दांत मांजते हुए पिछली पीढ़ी ने हमें सिखाया कि हमारे पास जो कुछ है, उसमें समाज का भी हिस्सा होता है। घोंसले से गिरे चिड़ियों के बच्चे मिलते तो हम भटकती बकरी का दूध निकालकर उन्हें पिलाते थे।"
अजित पवार को संबोधित करते हुए उन्होंने लिखा, "तेरी कपड़ों की अलग पसंद की वजह से राजेश खन्ना स्टाइल के कपड़े सिर्फ तेरे पास ही थे। दिवालियां आती-जाती रहेंगी, पर बचपन में चुभे कांटों के निशान अब चुभकर अकेलापन देते रहेंगे। मैं खेती करता हुआ बारामती में रहा और मेरे बच्चे भी यहीं रहे। तुम भाई-बहन मुंबई गए, तुम्हारे बच्चे वहीं पैदा हुए, पले-बढ़े और विदेश में पढ़े। इन सारी अगली पीढ़ियों को हमारे बचपन की अपनेपन वाली दिवाली कैसे समझ आएगी? हमारे रिश्ते की पक्की बुनावट और ऋणानुबंध के नाज़ुक धागे वे कैसे समझेंगे? हर मौके पर याद करना ही अब पीछे रह गया है... राजुदादा।"


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