6 नवंबर से शुरू होगी दिवाली, 7 को धनतेरस; पूजा के मुहूर्त और रस्में
तस्वीरें सत्यापित नहीं हैं
पांच दिन की दिवाली वसुबारस से शुरू होकर भाऊबीज पर खत्म होगी। नरक चतुर्दशी और लक्ष्मी पूजा इस बार एक ही दिन, 8 नवंबर को पड़ रही हैं।
पुणे, 5 नवंबर 2026: पांच दिन तक चलने वाला दिवाली का त्योहार 6 नवंबर को वसुबारस के साथ शुरू होगा। इसके बाद धनतेरस, नरक चतुर्दशी, लक्ष्मी-कुबेर पूजा, बलिप्रतिपदा और भाऊबीज आएंगे। इस साल खास बात यह है कि नरक चतुर्दशी और लक्ष्मी पूजा एक ही दिन, यानी 8 नवंबर को पड़ रही हैं।
दिवाली पूरे देश में पारंपरिक रस्मों, दीये जलाने, सजावटी कंदील, पकवानों और परिवार के मेल-मिलाप के साथ मनाई जाती है। तोहफों और शुभकामनाओं के लेन-देन से सामाजिक और पारिवारिक रिश्ते भी मजबूत होते हैं। घरों और दुकानों की सफाई और सजावट की जाती है और लोग मिठाई और दिवाली के पारंपरिक नाश्ते बांटकर त्योहार मनाते हैं।
शुक्रवार, 6 नवंबर को वसुबारस से त्योहार की शुरुआत होगी। परंपरा के मुताबिक सूरज ढलने के बाद गाय और उसके बछड़े की पूजा की जाती है। सुहागन महिलाएं व्रत रखती हैं और नंदिनी माता की पूजा करती हैं। जो लोग असली गाय और बछड़े के साथ यह रस्म नहीं कर सकते, वे उनकी मूर्तियों या तस्वीरों की पूजा कर सकते हैं। गौशालाओं की मदद करने को भी बढ़ावा दिया जाता है।
7 नवंबर को धनतेरस है, जो भगवान धन्वंतरि को समर्पित है। उन्हें स्वास्थ्य का देवता माना जाता है। इस दिन लोग सोना, सिक्के और गहनों की सफाई कर उनकी पूजा करते हैं, साथ ही देवी लक्ष्मी और भगवान कुबेर की भी पूजा होती है। शाम को आटे का दीया दक्षिण दिशा की ओर लौ करके जलाया जाता है। यह यमदीपदान की परंपरा है, जिसके बारे में माना जाता है कि वह अकाल मृत्यु को दूर रखती है।
रविवार, 8 नवंबर को नरक चतुर्दशी और लक्ष्मी-कुबेर पूजा होगी। नरक चतुर्दशी भगवान कृष्ण की नरकासुर पर जीत और उसके कैद में रखी गई महिलाओं की मुक्ति की याद में मनाई जाती है। इस दिन सुबह जल्दी उबटन और तेल लगाकर स्नान करने की परंपरा है, जिसे अभ्यंग स्नान कहते हैं। धार्मिक रस्मों में यमतर्पण भी किया जाता है।
उसी शाम समृद्धि, धन और खुशहाली के लिए लक्ष्मी और कुबेर की पूजा होती है। पूजा से पहले घर, दुकान और आसपास की जगह साफ कर सजाई जाती है। समृद्धि के प्रतीक के तौर पर चढ़ाई जाने वाली खील (लाई) का खास महत्व है। लक्ष्मी-कुबेर पूजा का शुभ समय शाम 5.50 बजे से रात 10.50 बजे तक है।
बलिप्रतिपदा, जिसे दिवाली पड़वा भी कहते हैं, मंगलवार, 10 नवंबर को मनाई जाएगी। यह दिन राजा बलि की पूजा को समर्पित है, जिन्हें उनकी दानशीलता के लिए याद किया जाता है। व्यापारी इस दिन बही-खाते और दुकान की पूजा कर नए कारोबारी साल की शुरुआत करते हैं। विवाहित जोड़े भी इसे मनाते हैं, जिसमें पत्नियां पति की आरती उतारती हैं और तोहफों व शुभकामनाओं का आदान-प्रदान होता है।
बही-खाते की पूजा के शुभ समय रात 2.10 बजे से सुबह 5.10 बजे तक, सुबह 6.35 बजे से 7.25 बजे तक और सुबह 11 बजे से दोपहर 2 बजे तक हैं।
बुधवार, 11 नवंबर को भाऊबीज के साथ त्योहार खत्म होगा, जो भाई-बहन के रिश्ते का दिन है। पौराणिक कथा के अनुसार मृत्यु के देवता यम अपनी बहन के घर गए थे और उनका आतिथ्य स्वीकार किया था। इसी परंपरा में बहनें भाइयों को खाने पर बुलाती हैं और आरती उतारती हैं, जबकि भाई अपनी बहनों को तोहफे देते हैं।
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