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मुंबई कोर्ट ने बांग्लादेशी महिला को सुनाई सात महीने की सजा, जेल के बाद वापस भेजा जाएगा

एस्प्लेनेड कोर्ट ने 28 साल की सुरमा जहांगीर खातून को अवैध रूप से भारत में घुसने और रहने का दोषी माना। सजा काटने के बाद उसे डिपोर्ट किया जाएगा।

मुंबई कोर्ट ने बांग्लादेशी महिला को सुनाई सात महीने की सजा, जेल के बाद वापस भेजा जाएगा तस्वीरें सत्यापित नहीं हैं

मुंबई की एस्प्लेनेड कोर्ट ने 28 साल की एक बांग्लादेशी महिला को भारत में गैरकानूनी तरीके से घुसने और रहने के मामले में सात महीने 10 दिन की सश्रम कैद की सजा सुनाई है। सजा पूरी होने के बाद उसे डिपोर्ट किया जाएगा। महिला का नाम सुरमा जहांगीर खातून है। उसे पार्कसाइट पुलिस ने 5 मार्च को गिरफ्तार किया था।

कोर्ट ने कुल 20,000 रुपये का जुर्माना भी लगाया है। उम्मीद है कि ठाणे सेंट्रल जेल में सजा पूरी करने के बाद उसे वापस भेजा जाएगा। अभियोजन पक्ष ने कोर्ट को बताया कि खातून को 2022 में एक बार डिपोर्ट किया जा चुका था, फिर भी वह दोबारा देश में आ गई।

अपर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट रोहिणी एस भोसले ने 19 अक्टूबर को यह फैसला सुनाया। अभियोजन के मुताबिक, 5 मार्च को API कुलदीप मोरे को टिप मिली कि अवैध रूप से भारत में घुसी होने के शक वाली एक महिला विक्रोली वेस्ट के पार्कसाइट में रोड नंबर 17 पर प्रबोधनकार ठाकरे उद्यान के पास आने वाली है।

मोरे के साथ महिला पुलिस नाइक प्रमिला गावित गश्त पर थीं। बाद में वही इस केस में पहली शिकायतकर्ता बनीं। वरिष्ठ अफसरों को खबर देने के बाद टीम ने दो स्वतंत्र पंच गवाहों की मौजूदगी में जाल बिछाया।

महिला करीब सुबह 11.50 बजे वहां पहुंची। भारतीय नागरिक होने का सबूत मांगने पर उसने संतोषजनक जवाब नहीं दिए। पंच गवाहों के सामने उसकी तलाशी ली गई तो बांग्लादेशी पहचान पत्र और पासपोर्ट की फोटोकॉपी मिलीं। इसके बाद गावित ने मौखिक शिकायत दर्ज कराई और मोरे ने 16 मई को चार्जशीट दाखिल की।

केस में एक अहम सबूत 4 अप्रैल 2022 का वह आदेश रहा, जिसके तहत खातून को पहले डिपोर्ट किया गया था। कोर्ट ने कहा कि यह आदेश अब भी लागू है और इसे किसी ने चुनौती नहीं दी। अभियोजन ने एक कारण बताओ नोटिस भी पेश किया, जिसमें खातून से अपनी राष्ट्रीयता साबित करने को कहा गया था, लेकिन वह ऐसा नहीं कर पाई।

मुफ्त कानूनी मदद के तहत खातून की वकील बनीं एडवोकेट कस्तूरी पांडे ने दलील दी कि घटना दिन दहाड़े भीड़ वाले इलाके में हुई, फिर भी अभियोजन ने किसी स्वतंत्र गवाह से पूछताछ नहीं की। कोर्ट ने यह दलील नहीं मानी कि पुलिस गवाहों की गवाही सिर्फ इसलिए छोड़ दी जाए कि वे सरकारी कर्मचारी हैं।

मजिस्ट्रेट ने इमिग्रेशन एंड फॉरेनर्स एक्ट की धारा 16 और सुप्रीम कोर्ट के अब्दुल सत्तार बनाम गुजरात राज्य (1964) के फैसले का हवाला दिया। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीयता साबित करने का जिम्मा आरोपी पर होता है। कोर्ट के मुताबिक खातून ने ऐसा कोई सबूत नहीं दिया जिससे साबित हो कि वह विदेशी नहीं है। BNSS 2023 की धारा 351 के तहत दर्ज बयान में भी उसने अपनी नागरिकता कबूल की। सरकारी वकील सारिका राउत ने कहा कि बिना इजाजत देश में रहना राष्ट्रीय सुरक्षा के लिहाज से चिंता की बात है।

पुलिस इंस्पेक्टर मुस्तक खान ने बताया कि विभाग ने वरिष्ठ अधिकारियों के निर्देश के मुताबिक कार्रवाई की। खान ने कहा, "कोर्ट ने अभियोजन के केस को माना है और डिपोर्ट करने का निर्देश दिया है। डिपोर्टेशन के आदेश के बावजूद कोई बांग्लादेशी वापस आता है तो हम सख्त कार्रवाई करते हैं।"

मोरे ने बताया कि जनवरी 2026 से अब तक पार्कसाइट पुलिस करीब 26 बांग्लादेशियों को डिपोर्ट करने की कानूनी कार्रवाई शुरू कर चुकी है, जिनमें तीन बच्चे भी हैं। महीने के आखिर तक दो और मामले निपटाए जाने की उम्मीद है। मोरे के मुताबिक इनमें से कई लोग रोजी-रोटी की तलाश में भारत आए थे। उन्होंने कहा, "स्पेशल ब्रांच II इन्हें पश्चिम बंगाल पहुंचाने का इंतजाम करेगी और BSF इनके डिपोर्टेशन में मदद करेगी। अवैध बांग्लादेशियों के खिलाफ हमारी मुहिम जारी रहेगी।" इस काम के लिए जोनल डिप्टी कमिश्नर ऑफ पुलिस (DCP) ने API कुलदीप मोरे का सम्मान भी किया।

वकील कस्तूरी पांडे ने बताया कि खातून अपने भाई इमोन के साथ बांग्लादेश लौटना चाहती है। इमोन भी अवैध रूप से भारत में रहने के आरोप में हिरासत में है। अपील के सवाल पर पांडे ने कहा, "अगर मेरी मुवक्किल मुझे अपील दाखिल करने को कहेगी तो मैं उसके निर्देश के हिसाब से काम करूंगी।"

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