युद्ध और अमेरिकी प्रतिबंधों से इरान की अर्थव्यवस्था चरमराई, GDP में 10 फीसदी से ज्यादा गिरावट
इरान युद्ध और अमेरिकी प्रतिबंधों की मार से गहरे आर्थिक संकट में फंसा, GDP गिरा और महंगाई भारत से 14 गुना ज्यादा
मिडल ईस्ट में चल रहे युद्ध और अमेरिका के सख्त आर्थिक प्रतिबंधों की वजह से इरान इस वक्त बहुत गंभीर आर्थिक संकट के मुहाने पर खड़ा है। अमेरिका और इस्राइल के साथ चल रहे टकराव में उलझे इरान की इकॉनॉमी दिन-ब-दिन कमजोर होती जा रही है और देश के अंदर हालात काफी बिगड़ चुके हैं।
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक चालू साल की पहली तिमाही में यानी मार्च के आखिर से जून के आखिर तक इरान के कुल घरेलू उत्पादन यानी GDP में पिछले साल की तुलना में 10.1 फीसदी की बड़ी गिरावट दर्ज की गई है। इंटरनेशनल मॉनेटरी फंड यानी IMF के अनुमान के मुताबिक 2026 तक इरान में औसत महंगाई दर 68.9 फीसदी तक रह सकती है। इसकी तुलना भारत से करें तो अगस्त 2026 में भारत में खुदरा महंगाई दर 4.82 फीसदी थी, यानी इरान की महंगाई भारत के मुकाबले करीब 14.3 गुना ज्यादा है।
इरान की इकॉनॉमी की रीढ़ कच्चे तेल और नैचुरल गैस का निर्यात है। लेकिन चल रहे युद्ध और अमेरिका की नई नाकेबंदी की वजह से इस निर्यात को बड़ा झटका लगा है। ग्लोबल ट्रेड के लिए बेहद अहम मानी जाने वाली होर्मुज जलडमरूमध्य में मालवाहक जहाजों की आवाजाही काफी धीमी पड़ गई है। रिपोर्ट के मुताबिक मार्च महीने में इरान रोजाना करीब 20 लाख बैरल कच्चे तेल का निर्यात कर रहा था, लेकिन अगस्त तक यह निर्यात घटकर रोजाना सिर्फ 2,20,000 से 2,55,000 बैरल पर आ गया है। इस भारी गिरावट की वजह से इरान के लिए विदेशी मुद्रा जुटाना लगभग नामुमकिन हो गया है। इरान की संसद के अध्यक्ष मोहम्मद बागेर गालिबाफ ने भी हालात की गंभीरता मानते हुए कहा कि पहले की नाकेबंदी के दौरान इरान एक बैरल तेल भी निर्यात नहीं कर पाया था और अब हालात फिर वैसे ही गंभीर होते जा रहे हैं।
इस टूटी हुई इकॉनॉमी की सबसे बड़ी और सीधी मार इरान की आम जनता पर पड़ रही है। अगस्त महीने में इरान की 12 महीने की औसत महंगाई दर 69.9 फीसदी तक पहुंच गई थी, जबकि पिछले साल अगस्त के मुकाबले चीजों के दाम 89 फीसदी तक बढ़ गए हैं। खासकर अनाज और रोजमर्रा की जरूरत की चीजों के दाम आसमान छूने से आम लोगों का जीना मुश्किल हो गया है। इसके साथ ही इरान की आधिकारिक करंसी रियाल भी लगातार कमजोर होती जा रही है। सितंबर की शुरुआत में खुले बाजार में 1 अमेरिकी डॉलर की कीमत 2.2 मिलियन रियाल से भी ज्यादा हो गई थी, जो एक साल पहले करीब 1 मिलियन रियाल थी। इस भारी महंगाई की वजह से इरान के नागरिकों की खरीदने की ताकत पूरी तरह खत्म हो चुकी है।
इरान के इंडस्ट्रियल सेक्टर पर भी इस युद्ध और आर्थिक तंगी का बहुत बुरा असर पड़ा है। अगस्त में कच्चे माल का स्टॉक दिखाने वाला इंडेक्स गिरकर 39.3 पर आ गया, जो जुलाई में 44.5 था। साथ ही इरान की इकॉनॉमी का पर्चेजिंग मैनेजर्स इंडेक्स यानी PMI 46.9 दर्ज किया गया है। इकॉनॉमिक्स के हिसाब से 50 से कम PMI का मतलब मंदी और मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में गिरावट होता है। इरान के आंकड़ा केंद्र के मुताबिक बाजार में कच्चे माल की भारी कमी की वजह से उत्पादन का खर्च काफी बढ़ गया है। इरान के चेंबर ऑफ कॉमर्स ने साफ चेतावनी दी है कि अगर हालात ऐसे ही बने रहे और कच्चे माल की सप्लाई ठीक नहीं हुई, तो देश के कई छोटे-बड़े कारखाने पूरी तरह बंद हो जाएंगे। कारखाने बंद होने से बेरोजगारी और बढ़ेगी और इरान की इकॉनॉमी पूरी तरह चरमरा जाएगी। इसलिए इस विनाशकारी आर्थिक संकट से बाहर निकलने के लिए इरान के पास युद्ध से बचकर बातचीत के जरिए रास्ता निकालने के अलावा कोई और चारा नहीं बचा है।