ट्रम्प को इस बार भी नोबेल शांति पुरस्कार मिलने की उम्मीद कम, ये हैं वजहें
9 अक्टूबर को होगा ऐलान। तीन देशों ने ट्रम्प को नामांकित किया है, फिर भी संभावना कमजोर बताई जा रही है।
नोबेल शांति पुरस्कार का ऐलान 9 अक्टूबर को होना है और पूरी दुनिया की नजर इस फैसले पर टिकी है। इसे दुनिया का सबसे प्रतिष्ठित सम्मान माना जाता है। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प को इस बार इस्राइल, कंबोडिया और पाकिस्तान जैसे देशों ने आधिकारिक तौर पर नामांकित किया है। फिर भी उन्हें यह पुरस्कार मिलने की संभावना बहुत कमजोर बताई जा रही है।
वैश्विक घटनाक्रम पर नजर रखने वाले विश्लेषकों के मुताबिक, ट्रम्प की कुछ अंतरराष्ट्रीय नीतियों की वजह से नोबेल समिति उनके नाम को पसंद करने के मूड में नहीं है।
ट्रम्प की राह में सबसे बड़ी अड़चन अमेरिका की ईरान के साथ सैन्य झड़प और जंग जैसे हालात हैं। इनका सीधा असर अंतरराष्ट्रीय शांति पर और लाखों लोगों की जिंदगी पर पड़ा है। इसके अलावा अमेरिका ने अंतरराष्ट्रीय न्यायालय (ICJ) पर पाबंदियां लगाईं और उसका फंड रोकने का फैसला किया। सूत्रों का कहना है कि इससे नोबेल समिति में काफी नाराजगी है। ICJ जैसी अहम संस्था को कमजोर करने की कोशिशें ट्रम्प के शांति पुरस्कार के दावे पर पानी फेर रही हैं।
2025 के नोबेल शांति पुरस्कार के वक्त भी खूब नाटकीय घटनाएं हुई थीं। आखिरी पल तक यह संभावना जताई जा रही थी कि ट्रम्प को वह पुरस्कार मिल सकता है। लेकिन समिति ने वेनेजुएला की लोकतंत्र समर्थक नेता मारिया कोरिना माचाडो को पुरस्कार दिया। फिर एक और मोड़ तब आया, जब माचाडो ने पुरस्कार स्वीकार करने के बाद उसे सीधे ट्रम्प को सौंप दिया। इस वाकये से नोबेल समिति को दुनिया भर में कुछ हद तक शर्मिंदगी झेलनी पड़ी थी।
इसी पृष्ठभूमि में ओस्लो की शांति शोध संस्था (PRIO) के कार्यवाहक निदेशक हाकॉन गेर्लो का कहना है कि नोबेल समिति इस बार बहुत सावधानी से कदम उठा रही है। समिति के सामने बड़ी चुनौती यह है कि ट्रम्प के संभावित राजनीतिक दबाव की परवाह किए बिना, स्वाभिमान के साथ ऐसे उम्मीदवार को चुने जो शांति का सच्चा संदेश देता हो। विशेषज्ञों का अंदाजा यह भी है कि अगर ट्रम्प को इस साल भी पुरस्कार नहीं मिला, तो वे विजेता या समिति की राजनीतिक आलोचना कर सकते हैं।
दौड़ में आगे कौन है, इस पर वैश्विक विश्लेषकों की राय है कि इस साल का पुरस्कार ट्रम्प की नीतियों का विरोध करने वाली, या मानवाधिकार और वैश्विक कानूनों की रक्षा करने वाली किसी संस्था को मिल सकता है। सबसे आगे अंतरराष्ट्रीय न्यायालय (ICJ), संयुक्त राष्ट्र के विशेष प्रतिनिधि और पोप लियो के नाम लिए जा रहे हैं। स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट के विशेषज्ञों के मुताबिक, नोबेल समिति इस साल ठोस फैसला लेने की तैयारी में है, ताकि यह साफ संदेश जाए कि वैश्विक शांति, लोकतंत्र और मानवाधिकारों की अहमियत बरकरार है।
कुल मिलाकर, 9 अक्टूबर को घोषित होने वाला नोबेल शांति पुरस्कार किसी को भी मिले, इस फैसले के केंद्र में अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ही रहेंगे, इसमें शक नहीं है।