सातारा की देवस्थान इनाम जमीन पर हेमंत मोरे का गड़बड़ी का आरोप, जांच की मांग
सामाजिक कार्यकर्ता हेमंत मोरे ने सातारा के करंजे तर्फ की 111.6 गुंठे देवस्थान इनाम जमीन के मालिकाना हक और फेरफार नोंदी पर सवाल उठाए हैं।
सातारा के करंजे तर्फ इलाके में देवस्थान इनाम वर्ग-३ की गट नं. १५५ की 111.6 गुंठे जमीन के मालिकाना हक और फेरफार नोंदी को लेकर गंभीर सवाल उठे हैं। सामाजिक कार्यकर्ता हेमंत मोरे ने पत्रकार परिषद में आरोप लगाया कि इस जमीन के सौदे में करोड़ों रुपये की गड़बड़ी हुई है।
मोरे ने जिलाधिकारी और महसूल विभाग से मांग की है कि पूरे मामले की गहरी जांच हो, गलत नोंदी रद्द की जाएं और जमीन पर सरकार का नाम दर्ज किया जाए।
हेमंत मोरे के मुताबिक, गट नं. १५५ की यह जमीन छत्रपती शाहू महाराज ने जनवरी १८७४ में सनद देकर गोपालनाथ महाराज देवस्थान को दी थी। उन्होंने बताया कि १९९४ में इस जमीन की मालकियत को लेकर दिवाणी दावा दाखिल हुआ था, जिसमें अदालत ने जमीन को देवस्थान इनाम की बताया है। मोरे का दावा है कि फैसले में यह भी साफ कहा गया है कि सोमगिरी या बापूगिरी गोसावी का इस जमीन पर मालिकाना हक साबित नहीं हुआ।
मोरे ने महसूल रिकॉर्ड में हुए फेरफार और उसके बाद की अपील प्रक्रिया का हवाला देते हुए आरोप लगाया कि कुछ नोंदी अदालती और महसूल आदेशों के खिलाफ की गईं। उनका दावा है कि २००४ में अपर जिलाधिकारी के आदेश में भी लिखा है कि संबंधित लोगों का जमीन पर मालिकाना हक नहीं है।
मोरे ने आरोप लगाया कि इसके बाद जमीन को देवस्थान इनाम वर्ग-३ से वर्ग-१ में बदलवाने के लिए गलत जानकारी दी गई। उनका यह भी आरोप है कि आगे चलकर इसकी खरीद-बिक्री के सौदे जावली और कोरेगाव तालुका के राजनीतिक लोगों के साथ हुए। इस पूरी प्रक्रिया में महसूल व्यवस्था के कुछ अधिकारियों और कर्मचारियों की भूमिका की भी जांच होनी चाहिए, यह मांग भी उन्होंने रखी।
मोरे ने कहा कि जमीन आगे ट्रांसफर होने की आशंका है, इसलिए जिलाधिकारी गट नं. १५५ को अपने कब्जे में लें, सभी संदिग्ध फेरफार रद्द करके सरकार का नाम लगाएं और संबंधित लोगों के खिलाफ फौजदारी कार्रवाई करें।
उन्होंने बताया कि इस मामले के अदालती आदेश, महसूल विभाग के आदेश, ७/१२ उतारा और अलग-अलग फेरफार की प्रतियों समेत ५८ पन्नों के कागजात जिलाधिकारी को सौंप दिए गए हैं।