सरकारी जमीन पर झोपु प्रोजेक्ट सालों अटके नहीं रह सकते, हाईकोर्ट ने सरकार को दिए निर्देश
चेंबूर की करीब 66 हजार वर्ग मीटर सरकारी जमीन के झोपु प्रोजेक्ट पर हाईकोर्ट ने कहा कि सरकार मूक दर्शक न बने और प्रोजेक्ट तय समय में पूरे करे।
सरकारी जमीन पर अतिक्रमण हो जाए तो राज्य सरकार और संबंधित प्राधिकरणों से मूक दर्शक बने रहने की उम्मीद नहीं की जाती। हाईकोर्ट ने झोपड़पट्टी पुनर्वसन योजना यानी झोपु के अटके हुए प्रोजेक्ट्स पर सुनवाई करते हुए यही बात कही। कोर्ट के मुताबिक सार्वजनिक संपत्ति को बचाने के साथ-साथ उसका पुनर्विकास जनहित में आगे बढ़ाना भी सरकार की जिम्मेदारी है।
अदालत ने निर्देश दिया कि सरकार "निष्क्रिय जमीन मालिक" की भूमिका न निभाए और प्रोजेक्ट तय समय सीमा में पूरे करे। जरूरत पड़े तो पात्र झोपड़ीधारकों को कहीं और बसाकर जमीन को सार्वजनिक काम के लिए इस्तेमाल करने पर भी विचार किया जाए।
ये बातें न्यायमूर्ति गिरीश कुलकर्णी और न्यायमूर्ति डॉ. नौला गोखले की बेंच ने कहीं। बेंच चेंबूर में करीब 66 हजार वर्ग मीटर सरकारी जमीन पर चल रही झोपु योजना से जुड़ी याचिकाओं की सुनवाई कर रही थी। कोर्ट ने साफ कहा कि प्राइवेट डेवलपरों के बीच कारोबारी झगड़े की वजह से सरकारी जमीन का प्रोजेक्ट सालों अटका रहना ठीक नहीं है।
कोर्ट ने यह भी कहा कि झोपड़ीधारकों को पुनर्वसन का हक जरूर है, लेकिन सरकारी जमीन पर उन्हें मालिकाना हक जैसे अधिकार नहीं मिल जाते। डेवलपर बदलने के लिए सिर्फ मतभेद काफी नहीं हैं, इसके लिए गंभीर कानूनी गड़बड़ी होनी चाहिए।
इस प्रोजेक्ट की कोशिशें अगस्त 2006 से चल रही हैं। 20 साल बाद भी पुनर्विकास की एक ईंट तक नहीं रखी गई है। कोर्ट ने कहा कि लगातार चल रहे अदालती झगड़ों से झोपु योजना का असली मकसद ही बेकार हो रहा है।
मामले की पृष्ठभूमि यह है कि 2006 में आदिशक्ती डेव्हलपर्स को इस प्रोजेक्ट का डेवलपर बनाया गया था। 2008 में 2,603 ढांचों का परिशिष्ट-2 प्रमाणित हुआ, जिनमें से 1,564 ढांचे पात्र पाए गए। कई विवादों के बाद 2021 में रुपारेल बिल्डकॉन को नया डेवलपर नियुक्त किया गया। उसे आशयपत्र और निर्माण की अनुमति भी मिल गई।
डेवलपर के बड़ी रकम लगाने के बाद कुछ झोपड़ीधारकों और संस्थाओं ने यह दावा करते हुए नियुक्ति को चुनौती दी कि 51 प्रतिशत की सहमति नहीं है। कोर्ट ने कहा कि डेवलपर का किया निवेश और प्रोजेक्ट आगे बढ़ाने के लिए उठाए गए कदम नजरअंदाज नहीं किए जा सकते। इसी आधार पर उसने रुपारेल को तुरंत हटाने से इनकार कर दिया।