सांकेतिक भाषा दिन: 23 सितंबर को क्यों मनाया जाता है, जानिए इतिहास और मकसद
हर साल 23 सितंबर को दुनियाभर में अंतरराष्ट्रीय सांकेतिक भाषा दिवस मनाया जाता है, जो कर्णबधिर समुदाय की भाषा और संस्कृति को सम्मान देने का दिन है।
हर साल 23 सितंबर को पूरी दुनिया में अंतरराष्ट्रीय सांकेतिक भाषा दिवस बड़े उत्साह और सम्मान के साथ मनाया जाता है। इस खास दिन की शुरुआत संयुक्त राष्ट्र महासभा ने अंतरराष्ट्रीय कर्णबधिर सप्ताह के एक अहम हिस्से के तौर पर की थी। 23 सितंबर की तारीख चुनने के पीछे भी एक ऐतिहासिक वजह है। साल 1951 में इसी दिन वर्ल्ड फेडरेशन ऑफ द डेफ नाम की अंतरराष्ट्रीय संस्था की स्थापना हुई थी, जिसने कर्णबधिर लोगों के मानवाधिकार और भाषाई हक के लिए लंबी लड़ाई लड़ी।
संयुक्त राष्ट्र ने इस दिन को आधिकारिक मान्यता देकर दुनिया को यह संदेश दिया है कि जिस तरह बोलकर बोली जाने वाली भाषा जरूरी है, उसी तरह हाथों और चेहरे के हावभाव से व्यक्त होने वाली सांकेतिक भाषा भी उतनी ही समृद्ध और अहम है। इस मौके पर स्कूल, कॉलेज, सरकारी दफ्तर और स्वयंसेवी संस्थाएं तरह-तरह की कार्यशालाएं, सांस्कृतिक कार्यक्रम, चर्चा सत्र और डिजिटल मुहिम चलाती हैं।
दुनियाभर में करीब 7 करोड़ से ज्यादा कर्णबधिर लोग हैं, जो 300 से ज्यादा अलग-अलग स्थानीय और राष्ट्रीय सांकेतिक भाषाओं का इस्तेमाल करते हैं। सांकेतिक भाषा सिर्फ कुछ इशारों का समूह भर नहीं है, बल्कि यह खुद में एक स्वतंत्र, व्याकरण के लिहाज से समृद्ध और पूरी तरह विकसित प्राकृतिक भाषा है। यह भाषा कर्णबधिर समुदाय के रोजमर्रा के जीवन, पढ़ाई, रोजगार और सामाजिक अस्तित्व की मुख्य बुनियाद है।
यह दिन सिर्फ कर्णबधिर लोगों के लिए नहीं, बल्कि पूरे समाज के लिए एक अहम सीख लेकर आता है। यह हमें सिखाता है कि अपनी बात कहने और भावनाएं दूसरों तक पहुंचाने के लिए सिर्फ बोले गए शब्दों की जरूरत नहीं होती। हावभाव, आंखों की भाषा और हाथों की हरकत से भी उतनी ही असरदार तरीके से मन की बात कही जा सकती है। कर्णबधिर समुदाय की अपनी एक खास संस्कृति है, जो आत्मसम्मान, बराबरी और आपसी सहयोग पर टिकी है।
आज के आधुनिक दौर में भी कई देशों में कर्णबधिर लोगों को सही शिक्षा, इलाज और अच्छे रोजगार के मौके पाने में दिक्कत आती है। इसकी बड़ी वजह है समाज में सांकेतिक भाषा की जानकारी और उसके प्रसार की कमी। अगर सरकारी दफ्तर, अस्पताल, कोर्ट, टीवी न्यूज और शिक्षण संस्थानों में सांकेतिक भाषा के दुभाषिए मौजूद हों, तो कर्णबधिर लोग बिना किसी रुकावट के समाज की मुख्यधारा में शामिल हो सकते हैं। जब कोई कर्णबधिर नागरिक अपनी भाषा में बिना किसी डर के अपनी बात रख पाता है, तभी अभिव्यक्ति की आजादी का असली मतलब पूरा होता है। सांकेतिक भाषा को कानूनी मान्यता देना और स्कूलों में इसे पढ़ाने को बढ़ावा देना सबको साथ लेकर चलने वाले विकास की राह खोलता है।
अंतरराष्ट्रीय सांकेतिक भाषा दिवस का मुख्य मकसद समाज में व्यापक जागरूकता फैलाना है। यह दिन हमें याद दिलाता है कि कर्णबधिर लोगों को दया की नजर से नहीं, बराबरी की नजर से देखा जाना चाहिए। हर किसी को बिना किसी भेदभाव के समाज में इज्जत से जीने और अपनी बात कहने का हक मिले, इसके लिए सांकेतिक भाषा का सम्मान करना और उसे फैलाना हम सबकी नैतिक जिम्मेदारी है। अगर हम सब सांकेतिक भाषा के बुनियादी पाठ सीखें और अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में इसे शामिल करें, तो हम ऐसा समाज बना सकते हैं जहां कोई भी बातचीत की कमी की वजह से अकेला न पड़े। भाषा जोड़ने वाली होनी चाहिए, तोड़ने वाली नहीं, और सांकेतिक भाषा दो अलग दुनियाओं को जोड़ने वाला एक खूबसूरत और मजबूत पुल है।