मंगलवार, 6 अक्टूबर 2026

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17:46 IST

सालों तक अर्जियां दबाने वाले अफसरों पर हाईकोर्ट सख्त, कहा जनता के सेवक हैं, मालिक नहीं

बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर खंडपीठ ने नागरिकों के आवेदनों पर सालों फैसला न लेने वाले सरकारी अधिकारियों के रवैये पर कड़ी नाराजगी जताई है।

सालों तक अर्जियां दबाने वाले अफसरों पर हाईकोर्ट सख्त, कहा जनता के सेवक हैं, मालिक नहीं
एआई से बनाई गई प्रतीकात्मक तस्वीर; यह घटना का वास्तविक फोटो नहीं है | PT24

नागपुर: नागरिकों के आवेदन और शिकायतों पर बरसों तक कोई फैसला न लेने वाले सरकारी अधिकारियों पर बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर खंडपीठ ने कड़ी नाराजगी जताई है। कोर्ट ने साफ शब्दों में कहा कि सरकारी अधिकारी जनता के सेवक हैं, मालिक नहीं। कोर्ट के मुताबिक अधिकारियों की लापरवाही की वजह से लोगों को अपने हक के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाना पड़ता है और इससे अदालत का भी बेवजह वक्त जाता है।

यह मामला न्यायमूर्ति अनिल पानसरे और न्यायमूर्ति निवेदिता मेहता की खंडपीठ के सामने आया। याचिकाकर्ता दिलीप ठाकरे ने अपनी सेवा से जुड़ी मांग को लेकर अक्टूबर 2018 से नवंबर 2023 के बीच नागपुर संभागायुक्त और जिला परिषद के मुख्य कार्यकारी अधिकारी को कई आवेदन दिए थे। इसके बावजूद उनके आवेदनों पर लंबे वक्त तक कोई फैसला नहीं हुआ। करीब छह साल तक प्रशासनिक स्तर पर कार्रवाई न होने के बाद ठाकरे को हाईकोर्ट जाना पड़ा।

सुनवाई के दौरान खंडपीठ ने प्रशासनिक कामकाज में होने वाली गैरजरूरी देरी पर भी सवाल उठाए। खंडपीठ ने कहा कि अधिकारी वक्त पर काम नहीं करते, इसीलिए नागरिकों को कोर्ट की शरण लेनी पड़ती है। ऐसी याचिकाओं में अदालत का अहम वक्त भी खर्च होता है।

कोर्ट ने याद दिलाया कि प्रशासनिक देरी रोकने के लिए 'महाराष्ट्र शासकीय कर्मचारियों के स्थानांतरण का नियमन और शासकीय कर्तव्यों में विलंब की रोकथाम अधिनियम' लागू है। फिर भी दोषी अधिकारियों पर इस कानून की धारा 10(3) के तहत कार्रवाई नहीं होती। इस वजह से यह कानून असरदार कार्रवाई के बजाय सिर्फ कागजों तक सिमट कर रह गया है।

कोर्ट ने ग्राम विकास सचिव के रवैये पर भी नाराजगी जताई। 31 अगस्त को कोर्ट ने ग्राम विकास विभाग के प्रधान सचिव को निर्देश दिया था कि वे मामले की खुद जांच करें और जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई करें। लेकिन सचिव ने खुद जांच करने के बजाय यह जांच उसी जिला परिषद के मुख्य कार्यकारी अधिकारी को सौंप दी, जिनके अधीन संबंधित अधिकारी काम कर रहे थे। इस पर हाईकोर्ट ने कड़ी नाराजगी जताते हुए सचिव से जवाब मांगा है।

खंडपीठ ने ग्राम विकास विभाग के सचिव को 6 अक्टूबर तक हलफनामा दाखिल करने का आदेश दिया है। इसमें सचिव को बताना होगा कि उन्होंने हाईकोर्ट के 31 अगस्त के आदेश के मुताबिक मामले की खुद जांच क्यों नहीं की, और इसके बजाय जिला परिषद के मुख्य कार्यकारी अधिकारी को अधीनस्थ कर्मचारियों के खिलाफ कार्रवाई करने का निर्देश क्यों दिया। याचिकाकर्ता की ओर से एडवोकेट अश्विन इंगोले ने पैरवी की।

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