प्यू रिसर्च सेंटर का प्रयोग: AI डिजिटल ट्विन के सर्वे इंसानों की राय से मेल नहीं खाए
प्यू रिसर्च सेंटर की 30 सितंबर 2026 की रिपोर्ट के मुताबिक AI से बने डिजिटल ट्विन असली लोगों की राय का सही प्रतिनिधित्व नहीं कर पाए।
आज AI हमारी रोज की जिंदगी का हिस्सा बन चुका है। छोटे-मोटे कामों में मदद से लेकर पेचीदा डेटा के विश्लेषण तक, हर जगह उसका दखल बढ़ रहा है। लेकिन सवाल बना हुआ है कि क्या AI इंसान के विचार, भावनाएं और राय उतनी ही सटीकता से समझ सकता है। हाल के दिनों में सिर्फ सवालों के जवाब देने या तस्वीरें बनाने से आगे बढ़कर जनमत का अंदाजा लगाने के लिए भी AI का इस्तेमाल शुरू हुआ है। इन्हें 'कृत्रिम सर्वेक्षण' (Synthetic Polls) कहा जा रहा है।
जगप्रसिद्ध अंतरराष्ट्रीय संशोधन संस्था 'प्यू रिसर्च सेंटर' (Pew Research Center) के एक खास प्रयोग ने इन सर्वेक्षणों की सटीकता पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। संस्था की 30 सितंबर 2026 को जारी रिपोर्ट के मुताबिक AI से बनाए गए डिजिटल सहभागियों के जरिए हुए सर्वे असली इंसानी जनमत का प्रतिनिधित्व करने में पूरी तरह नाकाम रहे।
इस रिसर्च के लिए संस्था ने अपने अमेरिकन ट्रेंड्स पैनल (ATP) के असली सहभागियों की उम्र, जनसांख्यिकीय जानकारी (Demographics) और दूसरी निजी खासियतों के आधार पर AI के 'डिजिटल ट्विन' (Digital Twins) तैयार किए। पहले हो चुके तीन सर्वे इन AI सहभागियों के साथ दोबारा कराए गए और उनके जवाबों को असली लोगों से मिले डेटा से मिलाया गया।
नतीजे चौंकाने वाले रहे। करीब 300 अलग-अलग सामाजिक और राजनीतिक सवालों को देखने पर AI और असली जवाबों के बीच औसतन 12 प्रतिशत अंक का फर्क निकला। करीब 28 प्रतिशत सवालों में यह फर्क 15 प्रतिशत अंक से ज्यादा था। कुछ मुद्दों पर AI और इंसानी राय के बीच की यह खाई 20, 30 और यहां तक कि 40 प्रतिशत अंक तक पहुंच गई।
कुछ सामाजिक और राजनीतिक गुटों के मामले में AI की गलतियां और भी गंभीर थीं। मसलन AI ने अंदाजा लगाया कि 97 प्रतिशत हिस्पैनिक वयस्क कम से कम कुछ हद तक फुटबॉल विश्वचषक देखेंगे, जबकि असली सर्वे में यह आंकड़ा सिर्फ 43 प्रतिशत निकला। AI ने यह भी माना कि 95 प्रतिशत रिपब्लिकन समर्थक इस्राइल को सकारात्मक नजर से देखते हैं, जबकि असल में सिर्फ 58 प्रतिशत रिपब्लिकन नागरिकों ने ऐसा कहा। इसी तरह AI का अंदाज था कि 86 प्रतिशत डेमोक्रेट अरबपतियों को देश के लिए बुरा मानते हैं, पर असली आंकड़ा सिर्फ 45 प्रतिशत था।
इंसानी सोच का एक अहम हिस्सा दुविधा या संभ्रम है। जब किसी को जवाब पता नहीं होता या वह किसी मुद्दे पर पक्का नहीं होता, तो वह आसानी से 'मुझे नहीं पता' या 'पक्का नहीं' (Not Sure) चुन लेता है। इस प्रयोग में असली लोगों ने करीब 16 प्रतिशत बार यह विकल्प चुना, जबकि AI सहभागियों ने सिर्फ 4 प्रतिशत बार। यानी AI जनमत की उलझन और अस्पष्टता पकड़ने में नाकाम दिखा।
2026 की शुरुआत में सामने आई कई बड़ी राजनीतिक घटनाओं पर भी AI के अंदाज गलत निकले। अमेरिका के राष्ट्रपति के कामकाज को मंजूरी देने वाले नागरिकों की संख्या AI ने जरूरत से ज्यादा दिखाई। वहीं इमिग्रेशन अधिकारियों के अपनी पहचान छिपाने के लिए चेहरा ढकने को ठीक मानने वाले रिपब्लिकन नागरिकों की संख्या उसने असली आंकड़ों से काफी कम बताई।
रिपोर्ट का एक और अहम पहलू यह है कि अलग-अलग AI मॉडल एक ही सवाल पर उलटे नतीजे देते हैं। प्यू रिसर्च सेंटर ने टेस्ट के लिए OpenAI का GPT-5.1 और Anthropic का Claude Opus 4.6, ये दो अत्याधुनिक AI मॉडल इस्तेमाल किए थे। दोनों के नतीजे असली इंसानी राय से तो मेल नहीं खाए ही, खुद इन दोनों के नतीजों में भी काफी फर्क दिखा। इससे साफ होता है कि सिर्फ यह कह देना काफी नहीं कि सर्वे AI ने किया है। यह समझना भी उतना ही जरूरी है कि पीछे कौन सा मॉडल और कौन सा एल्गोरिदम इस्तेमाल हुआ।
इस प्रयोग का मतलब यह बिल्कुल नहीं कि AI बेकार है। भारी-भरकम डेटा का तेजी से विश्लेषण करने, भविष्य की संभावनाओं का मसौदा बनाने या ट्रेंड्स का अध्ययन करने के लिए वह बहुत काम का साधन है। लेकिन जब इंसानी सोच, निजी अनुभव, सामाजिक मूल्यों और भावनाओं की सटीक राय लेने की बात आती है, तो असली लोगों से बात करके उनकी राय जानना ही अकेला भरोसेमंद तरीका है।