पेट्रोल में एथेनॉल के बाद अब CNG-PNG में भी बायोगैस मिलाना होगा अनिवार्य
सरकार ने गोवर्धन योजना के तहत CNG और PNG कंपनियों के लिए बायोगैस ब्लेंडिंग को चरणबद्ध तरीके से अनिवार्य कर दिया है।
पेट्रोल में एथेनॉल मिलाने का प्रयोग कामयाब होने के बाद अब सरकार ईंधन के मामले में एक और बड़ा कदम उठाने की तैयारी में है। इस बार निशाने पर हैं गाड़ियों में इस्तेमाल होने वाली CNG और घरों में खाना बनाने के काम आने वाली PNG गैस।
इसके लिए सरकार ने संकुचित बायोगैस यानी CBG के लिए 23,731 करोड़ रुपये की 'गोवर्धन' योजना शुरू की है। इस योजना का मकसद कचरे और गोबर से होने वाली कमाई को बढ़ाना और साथ ही प्रदूषण को कम करना है। योजना के तहत सरकार बायोगैस प्लांट मालिकों के बनाए हुए 100 प्रतिशत गैस को या तो खुद खरीदेगी, या फिर किसी बड़ी गैस कंपनी को बिकवा देगी। यानी बायोगैस बनाने वालों को अपने पूरे उत्पादन की गारंटी मिलेगी, साथ ही कम से कम 10 साल के लिए सरकार की तय की हुई कीमत और पूंजी में मदद भी मिलेगी। मतलब बाजार में गैस का भाव चाहे जो भी हो, अगले 10 साल तक सरकार एक रेट तय कर देगी, जिससे प्लांट मालिकों को मुनाफे में समझौता नहीं करना पड़ेगा।
गोवर्धन योजना के लक्ष्य पूरे करने के लिए सरकार ने कॉम्प्रेस्ड बायोगैस ऑब्लिगेशन यानी CBO को कानूनी तौर पर जरूरी बना दिया है। सिटी गैस डिस्ट्रिब्यूशन यानी CGD कंपनियों के लिए अपने CNG और PNG नेटवर्क में इसे मिलाना कानूनन बंधनकारक होगा। शुरुआत में, कंपनियों और उत्पादकों दोनों को तैयारी के लिए वक्त देने के इरादे से वित्त वर्ष 2024-25 से 2025-26 तक इसे स्वैच्छिक रखा गया था।
अब वित्त वर्ष 2026-27 से कंपनियों को अपने कुल गैस हिस्से का 3 प्रतिशत बायोगैस में मिलाना अनिवार्य होगा। मतलब अगर गेल यानी GAIL या अडानी गैस जैसी कोई बड़ी कंपनी सालाना 100 टन CNG बेचती है, तो उसे 2026-27 में 3 टन बायोगैस खरीदकर मिलानी होगी। ऐसा न करने पर सरकार जुर्माना लगाएगी। वित्त वर्ष 2027-28 में यह लक्ष्य बढ़कर 4 प्रतिशत हो जाएगा, और वित्त वर्ष 2028-29 से आगे सभी बड़ी गैस कंपनियों के लिए CNG और PNG में 5 प्रतिशत बायोगैस मिलाना जरूरी कर दिया जाएगा।
इस फैसले के कई फायदे गिनाए जा रहे हैं। सबसे बड़ी बात यह कि प्लांट मालिकों को अब गैस बेचने के लिए मार्केटिंग या विज्ञापन पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा, क्योंकि सरकारी लक्ष्य के हिसाब से कंपनियां खुद प्लांट पर आकर गैस खरीदेंगी। इससे प्रदूषण में भी अच्छी-खासी कमी आने की उम्मीद है, क्योंकि सर्दियों में प्रदूषण की वजह बनने वाले फसलों के अवशेष जलाने के बजाय अब उनका इस्तेमाल गैस बनाने में होगा। गांव और शहरों के गीले कचरे को सीधे प्लांट में प्रोसेस किया जाएगा, जिससे कचरा खुले में नहीं फैलेगा।
ग्रामीण इलाकों में पशुपालक या धान की पराली और गन्ने की खोई जैसा खेती का कचरा रखने वाले किसान उसे बायोगैस प्लांट को बेचकर हर महीने पक्की कमाई कर सकेंगे। इससे रोजगार के मौके भी बढ़ेंगे, क्योंकि गोबर और पराली जैसा कच्चा माल इकट्ठा करने, प्लांट तक पहुंचाने और प्लांट के काम-काज के लिए लोगों की जरूरत पड़ेगी। इसके अलावा बायोगैस बनने के बाद यह प्लांट बड़ी मात्रा में जैविक खाद भी तैयार करता है, जो यूरिया और डीएपी जैसी रासायनिक खादों से सस्ती होगी। इससे जमीन उपजाऊ बनेगी, फसलों की क्वालिटी सुधरेगी और लोगों की सेहत पर भी इसका अच्छा असर पड़ेगा।