पनीर के नाम पर देशभर में चर्चा, FSSAI के मसौदे का श्रेय मुंढे की कार्रवाई को देने की होड़
FSSAI ने डेयरी न होने वाले उत्पादों को पनीर नाम से बेचने पर रोक का प्रस्ताव रखा; महाराष्ट्र में पहले से ही अॅनालॉग पनीर पर साल भर की बंदी लागू है।
पनीर के नाम को लेकर देशभर में एक नई बहस छिड़ गई है। भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण यानी FSSAI ने 24 सितंबर 2026 को पनीर से जुड़ा एक Draft Amendment Regulations जारी किया है। इस मसौदे का मकसद यह है कि जो उत्पाद दूध से नहीं बने होते लेकिन पनीर जैसे दिखते हैं, उन्हें "पनीर" के नाम से बेचने पर रोक लगाई जाए। इसके बाद सोशल मीडिया पर फेक पनीर और अॅनालॉग पनीर को लेकर खूब चर्चा शुरू हो गई।
कई सोशल मीडिया यूजर्स इस मसौदे का श्रेय महाराष्ट्र FDA कमिश्नर तुकाराम मुंढे की अगुवाई में हुई कार्रवाई को दे रहे हैं। लेकिन इन दोनों घटनाओं के बीच सीधा कारण-परिणाम का रिश्ता होना FSSAI के आधिकारिक कागजात से साबित नहीं होता। FSSAI के रिकॉर्ड में यह अभी सिर्फ एक मसौदा है, अंतिम नियम नहीं बना है।
अॅनालॉग या नॉन-डेयरी पनीर वह चीज है जो देखने में पारंपरिक दूध से बने पनीर जैसी लगती है, मगर उसमें दूध की चर्बी की जगह वनस्पति तेल या दूसरे नॉन-डेयरी तत्व इस्तेमाल किए जाते हैं। FSSAI के इस नए मसौदे से कोशिश यह है कि ऐसे उत्पादों को पारंपरिक दुग्ध पनीर बताकर बेचने के नियम और साफ किए जाएं, ताकि ग्राहक को धोखे में न रखा जाए। यह मसौदा फिलहाल पब्लिक सुझाव और आपत्तियों के लिए रखा गया है, इसलिए अंतिम अधिसूचना आने तक इसे पूरी तरह लागू नियम नहीं माना जा सकता।
FSSAI के इस प्रस्ताव से पहले ही महाराष्ट्र ने अॅनालॉग या नॉन-डेयरी पनीर के खिलाफ सख्त रुख अपना लिया था। महाराष्ट्र के Food and Drug Administration ने 30 जुलाई 2026 के आदेश से ऐसे पनीर के उत्पादन, प्रोसेसिंग, स्टोरेज, ट्रांसपोर्ट, डिस्ट्रीब्यूशन और बिक्री पर एक साल के लिए रोक लगा दी। यह आदेश Food Safety and Standards Act, 2006 की धारा 30(2)(a) के तहत जारी किया गया। इसका असर होटल, रेस्टोरेंट, केटरर्स और क्लाउड किचन पर भी पड़ा, जिन्हें नॉन-डेयरी पनीर का इस्तेमाल बंद करने के निर्देश दिए गए।
महाराष्ट्र FDA की जांच में अप्रैल 2025 से मार्च 2026 के बीच 308 पनीर और डेयरी-अॅनालॉग नमूने चेक किए गए, जिनमें से 109 नमूने यानी करीब 35.4 फीसदी तय मानकों पर खरे नहीं उतरे। इनमें 79 नमूने सब-स्टैंडर्ड और 30 नमूने असुरक्षित करार दिए गए। लैब जांच में कुछ नमूनों में दूध की चर्बी के लिए तय सीमा से अलग Butyro-Refractometer रीडिंग और Iodine Value मिली, जिससे संकेत मिलता है कि इनमें वनस्पति चर्बी का इस्तेमाल हुआ या दूध की चर्बी की जगह उसने ले ली।
महाराष्ट्र FDA ने एक और अहम बात उठाई कि कई जगह नॉन-डेयरी पनीर इस्तेमाल होने के बावजूद मेन्यू, बिल या डिस्प्ले पर इसकी जानकारी नहीं दी जा रही थी, जिससे ग्राहक को लगता है कि वह पारंपरिक दूध से बना पनीर खा रहा है। इस वजह से यह मामला सिर्फ खाने की क्वालिटी तक सीमित न रहकर लेबलिंग और ग्राहक के जानकारी के हक से भी जुड़ गया।
महाराष्ट्र में यह कार्रवाई Food Safety Commissioner तुकाराम मुंढे के कार्यकाल में हुई, और राज्य FDA की इस कार्रवाई को खूब प्रचार मिला, जिससे अॅनालॉग पनीर का मुद्दा सोशल मीडिया पर भी छा गया। कुछ पोस्ट में FSSAI के राष्ट्रीय मसौदे को महाराष्ट्र की पहले की कार्रवाई से जोड़कर "महाराष्ट्र आगे, देश उसके पीछे" जैसी प्रतिक्रियाएं दी जा रही हैं। मगर FSSAI के आधिकारिक Draft notification में तुकाराम मुंढे या महाराष्ट्र का इस प्रस्ताव के सीधे कारण के तौर पर कोई जिक्र नहीं है।
अॅनालॉग पनीर के खिलाफ कार्रवाई सिर्फ महाराष्ट्र से शुरू नहीं हुई। मिली जानकारी के मुताबिक छत्तीसगढ़ ने 30 जुलाई 2026 को ही नॉन-स्टैंडर्डाइज्ड डेयरी अॅनालॉग्स के उत्पादन, स्टोरेज, ट्रांसपोर्ट, डिस्ट्रीब्यूशन और बिक्री पर साल भर की रोक लगाई थी। इसके बाद महाराष्ट्र के साथ गुजरात जैसे राज्यों ने भी अॅनालॉग डेयरी उत्पादों के खिलाफ सख्त कदम उठाए। अगस्त 2026 में Zomato ने भी अपने प्लेटफॉर्म पर अॅनालॉग डेयरी वाले आइटम्स के खिलाफ zero-tolerance पॉलिसी लागू की और ऐसे आइटम बताने वाले रेस्टोरेंट पार्टनर्स से या तो नैचुरल डेयरी इस्तेमाल करने या उन्हें मेन्यू से हटाने को कहा।
फिलहाल FSSAI का यह प्रस्ताव अंतिम नियम नहीं बना है, इसलिए आगे क्या सुझाव और आपत्तियां आती हैं, इसी पर तय होगा कि अंतिम नियम किस रूप में लागू होता है और इसका असर अॅनालॉग पनीर बनाने वालों, फूड बिजनेस और ग्राहकों पर कैसा पड़ता है। तब तक महाराष्ट्र में एक साल की बंदी अपनी जगह अलग से लागू है।