नागपुर की नई कमर्शियल इमारतों में पार्किंग, लिफ्ट और सेफ्टी की कमी पर उठे सवाल
एक रियल एस्टेट लेखक का कहना है कि सिविल लाइंस, रामदासपेठ और धंतोली में ऊंची इमारतें तो बन रही हैं, पर पार्किंग, लिफ्ट और फायर सेफ्टी पीछे छूट गई हैं।
नागपुर का स्काईलाइन बहुत तेज़ी से बदल रहा है। सिविल लाइंस, रामदासपेठ और धंतोली जैसे पुराने इलाकों में ऊंची कमर्शियल इमारतें खड़ी हो रही हैं। रियल एस्टेट पर लिखने वाले एक लेखक का कहना है कि ब्रोशर में सब चमकदार दिखता है, लेकिन शहरी प्लानिंग, बिल्डरों की जवाबदेही और सेफ्टी का इंतज़ाम इस रफ्तार से बहुत पीछे है।
सबसे बड़ी दिक्कत पार्किंग की है। महाराष्ट्र के UDCPR नियमों में कमर्शियल जगह के हर 100 वर्ग मीटर (करीब 1,076 वर्ग फुट) पर एक कार पार्किंग देनी होती है। लेखक के मुताबिक 1 लाख वर्ग फुट की जिस इमारत में 200 से ज़्यादा ऑफिस हों, वहां नियम से सिर्फ 100 पार्किंग बनती हैं। TOD मेट्रो कॉरिडोर में यह घटकर करीब 50 रह जाती हैं। कागज़ पर आंकड़ा पूरा करने के लिए बिल्डर मैकेनिकल स्टैक और पज़ल पार्किंग लगा देते हैं, मगर नागपुर की तेज़ गर्मी में गाड़ी निकालने में देर और बार-बार खराबी की वजह से लोग इन्हें छोड़ देते हैं। नतीजा यह कि गाड़ियां सड़कों पर आ जाती हैं और बड़ी सड़कों पर जाम लगता है। VR Mall, Riaan House और सदर की श्रीराम टावर जैसी गिनी-चुनी इमारतों को छोड़ दें तो लगभग हर बड़ी कमर्शियल बिल्डिंग में पार्किंग कम पड़ती है।
लिफ्ट का हाल भी ऐसा ही है। लेखक का कहना है कि बिल्डर कानून में जितनी कम से कम लिफ्टें ज़रूरी हैं, उतनी ही लगाते हैं, इसलिए भीड़ के वक्त लॉबी में लंबा इंतज़ार करना पड़ता है।
MahaRERA के नियम के हिसाब से कमर्शियल जगह असली बिल्टअप एरिया पर बेची जानी चाहिए। लेखक के मुताबिक सेल्स टीम फिर भी बढ़े हुए "सुपर बिल्ट-अप" आंकड़े बताती है, जिससे प्रति वर्ग फुट रेट कम दिखता है। सेल डीड के वक्त बिल्डर असली बिल्टअप या कारपेट एरिया पर लौट आते हैं। यानी खरीदार को कॉमन जगह की भी पूरी कीमत देनी पड़ती है।
वर्धा रोड और सिविल लाइंस में कांच की बड़ी दीवारों वाली इमारतों पर भी लेखक ने सवाल उठाया है। +45 डिग्री सेल्सियस की गर्मी में कांच से ग्रीनहाउस जैसा असर बनता है और AC का खर्च बहुत बढ़ जाता है। ऊंची इमारतों की खिड़कियां धोने वाले क्रेडल और खास सफाई टीमें यहां लगभग हैं ही नहीं।
नीति और नगर निगम की तैयारी पर भी लेखक ने चिंता जताई है। पूरे महाराष्ट्र में एक जैसे UDCPR मानक लागू होने से नागपुर को मुंबई या पुणे जैसा मान लिया जाता है, जबकि यहां का लेआउट, मौसम और निजी गाड़ियों पर निर्भरता अलग है। बहुत सारी कमर्शियल इमारतें आधुनिक फायर फाइटिंग सिस्टम या नागपुर महानगरपालिका (NMC) के वैध ऑक्यूपेशन सर्टिफिकेट (OC) के बिना चल रही हैं। इमारतें 70 से 100 मीटर तक पहुंच रही हैं, लेकिन फायर सर्विस के पास बहुत ऊंचाई तक पहुंचने वाली हाइड्रॉलिक सीढ़ियां नहीं हैं।
लेखक ने बेंगलुरु का उदाहरण दिया है, जहां उन्होंने क्षेत्रीय बैंकिंग क्लाइंट्स के लिए ऑफिस देखे। वहां टॉप कमर्शियल प्रोजेक्ट में प्रति 1,000 वर्ग फुट पर 2 कार पार्किंग मिलती है, जो नागपुर के मानक से दोगुनी है। पार्किंग स्लॉट अलग से 3,000 से 10,000 रुपये प्रति माह पर किराए पर भी दिए जाते हैं। उनका सुझाव है कि नागपुर में ग्रेड-A प्रोजेक्ट को प्रति 1,000 वर्ग फुट पर 3 कार पार्किंग रखनी चाहिए, यानी 1 लाख वर्ग फुट की इमारत में करीब 300।
लेखक के मुताबिक कई कारोबारी 30 साल पुरानी इमारतों में 5,000 से 8,000 रुपये प्रति वर्ग फुट पर जगह खरीदकर इंटीरियर पर 5,000 रुपये प्रति वर्ग फुट खर्च करते हैं। वहीं कुछ बिल्डर साइड मार्जिन में गैरकानूनी निर्माण करते हैं और टॉप फ्लोर की छत को प्राइवेट यूनिट बना देते हैं। उनका कहना है कि 100 फीसदी FSI इस्तेमाल करने की सोच छोड़कर क्वालिटी, बड़ी लॉबी और अच्छी पार्किंग पर ध्यान देना चाहिए।
लेखक ने नागपुर के कुछ अग्रणी प्रोजेक्ट भी गिनाए हैं। इनमें बायरामजी टाउन में छिंदवाड़ा रोड पर 1990 के दशक का पूनम चेम्बर्स, सिविल लाइंस का SDPL का गुलमोहर (1995 में करीब 2,500 वर्ग फुट का डुप्लेक्स 20 लाख रुपये में), अमृता मनोर और हेरिटेज (1999 से 2000), सदर की श्रीराम टावर, तथा कुकरेजा इन्फ्रास्ट्रक्चर और श्री भागीरथ रियल्टी के प्रोजेक्ट शामिल हैं। लेखक के मुताबिक आज नागपुर में लग्ज़री अपार्टमेंट 10 से 20 करोड़ रुपये तक में बिक रहे हैं।
लेखक ने डॉ. टी. चंद्रशेखर (IAS) को भी याद किया है, जो 2000 से 2002 तक NMC के आयुक्त और नागपुर सुधार प्रन्यास (NIT) के अध्यक्ष रहे और जिन्होंने इंटीग्रेटेड रोड डेवलपमेंट प्रोजेक्ट (IRDP) चलाया। आखिर में उनकी सलाह है कि इमारत बनाने के बाद उसका रखरखाव भी बिल्डर के ब्रांड का हिस्सा होना चाहिए।