मुंबई के स्कूलों में 'बाल दृष्टी': 40 हजार से ज्यादा बच्चों की आंखें जांची गईं, लक्ष्य 3 लाख
पढ़ाई में पिछड़ने वाले कई बच्चे असल में बोर्ड ठीक से नहीं देख पाते। बृहन्मुंबई महानगरपालिका और विजन फाउंडेशन ऑफ इंडिया की पहल उन्हें इलाज से जोड़ रही है।
तस्वीरें सत्यापित नहीं हैं
मुंबई के नगर निगम स्कूलों में पढ़ने वाले जो बच्चे बोर्ड पर लिखा साफ नहीं देख पाते और इसी वजह से पढ़ाई में पिछड़ जाते हैं, उनकी आंखों का इलाज कराने के लिए एक नई मुहिम चल रही है। बृहन्मुंबई महानगरपालिका और विजन फाउंडेशन ऑफ इंडिया ने मिलकर इसे 'बाल दृष्टी' नाम दिया है। बताया जा रहा है कि इस तरह की यह देश में पहली पहल है, और मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने खुद आगे बढ़कर इसे शुरू कराया है।
मुहिम का लक्ष्य बड़ा है। तीन साल के भीतर निगम के 1,200 स्कूलों के करीब तीन लाख बच्चों की आंखें जांची जानी हैं। यह काम आयुष्मान भारत के तहत चल रहे स्कूल स्वास्थ्य और कल्याण कार्यक्रम से जोड़कर किया जा रहा है, और सारा जोर अपवर्तन दोष यानी चश्मे के नंबर वाली खराबी को पकड़ने और ठीक करने पर है।
आयोजकों का कहना है कि 75 प्रतिशत से ज्यादा नजर की खराबियां ऐसी होती हैं जिन्हें या तो होने से रोका जा सकता है या इलाज से सुधारा जा सकता है। दिक्कत यह है कि बच्चे खुद बता ही नहीं पाते कि उन्हें दिखाई कम दे रहा है। वे बोर्ड के पास जाकर बैठ जाते हैं, पढ़ने से कतराते हैं या बोर्ड से कॉपी में उतारने में बहुत देर लगाते हैं। घर और स्कूल में अक्सर इसे बच्चे की लापरवाही या पढ़ाई में मन न लगना मान लिया जाता है। 'बाल दृष्टी' इसी गलती को वक्त रहते पकड़ने और बच्चे को इलाज तक पहुंचाने की कोशिश है।
काम कितना आगे बढ़ा है, इसके आंकड़े भी सामने आए हैं। फरवरी से सितंबर 2026 के बीच 227 निगम स्कूलों के 40 हजार 270 बच्चों की आंखें जांची जा चुकी हैं। इन स्कूलों में कुल 59 हजार 150 बच्चे दर्ज हैं, यानी करीब 68 प्रतिशत तक जांच पहुंच गई है। जांच कराने वालों में 20 हजार 390 लड़के और 19 हजार 880 लड़कियां हैं, तो दोनों की हिस्सेदारी लगभग बराबर रही।
जांच में कुछ गंभीर मामले भी निकले। एक बच्चे की एक आंख में माइनस 11.50 एसपीएच का निकट दृष्टि दोष मिला, और कुछ बच्चों की रिपोर्ट में तो यह माइनस 16 एसपीएच तक गया। जानकारों के मुताबिक शून्य को सामान्य नजर माना जाता है और माइनस 6 से ऊपर की स्थिति को उच्च निकट दृष्टि दोष कहा जाता है। इतने नंबर पर चंद सेंटीमीटर से आगे की चीजें भी धुंधली दिखने लगती हैं। एक बच्चे में मोतियाबिंद भी पकड़ में आया। कई बच्चों की ऐसी आंखों की बीमारियां, जो घर या कक्षा में किसी को दिखी ही नहीं थीं, इस जांच की वजह से सामने आ गईं।
इलाज का सिलसिला भी शुरू हो चुका है। अब तक 361 बच्चों को चश्मे दिए जा चुके हैं। जिन बच्चों में किसी बीमारी का शक होता है, उन्हें ताडदेव रोड पर विजन फाउंडेशन ऑफ इंडिया के कम्युनिटी आय क्लिनिक भेजा जाता है, जहां उनकी बारीकी से जांच होती है। उसके बाद तय किया जाता है कि बच्चे को चश्मा चाहिए, किसी विशेषज्ञ को दिखाना होगा या ऑपरेशन की जरूरत है। टीमें घर और स्कूल जाकर माता-पिता से लगातार मिलती रहती हैं और इलाज पूरा होने तक फॉलो-अप चलता है। अब तक चार बच्चों की भेंगेपन की सर्जरी हो चुकी है।
जांच में 31 बच्चे ऐसे मिले हैं जिन्हें रंग पहचानने में दिक्कत है। यह खराबी ठीक नहीं की जा सकती, लेकिन समय पर पता चल जाए तो माता-पिता और शिक्षक पढ़ाने का तरीका उसी हिसाब से बदल सकते हैं। आगे चलकर पढ़ाई की दिशा और करियर चुनते वक्त भी इस जानकारी से सही सलाह देने में मदद मिलती है।
मुख्यमंत्री फडणवीस ने जांच करने, मरीजों को आगे भेजने और घर जाकर फॉलो-अप करने वाली निगम और विजन फाउंडेशन की टीमों के काम का संज्ञान लिया है। बोर्ड न दिखने वाले बच्चों को लापरवाह समझ लिए जाने से पहले ही उन्हें जरूरी आंखों की सेवा से जोड़ने के लिहाज से यह पहल अहम साबित हो रही है।
देश के हालात देखें तो तस्वीर और गंभीर दिखती है। अनुमान है कि देश में करीब 93 लाख बच्चे दृष्टिबाधित हैं। 'इंडियन जर्नल ऑफ ऑप्थैल्मोलॉजी' में 2022 में छपे एक अध्ययन के मुताबिक बच्चों के अंधेपन की वजह से भारत की सकल राष्ट्रीय आय को लगभग 1,300 करोड़ रुपये का परोक्ष नुकसान होता है। अपवर्तन दोष और एम्ब्लायोपिया यानी आलसी आंख को बच्चों में अंधेपन के मुख्य कारण बताया गया है, और ज्यादातर मामलों में इलाज या रोकथाम मुमकिन है।