ज्येष्ठा गौरी 2026: 17 से 19 सितंबर तक आवाहन, पूजन और विसर्जन की तारीखें, मुहूर्त तय
महाराष्ट्र में गणपति बप्पा के आने के बाद तीन दिन के लिए घर आती हैं गौरी, जानिए इस साल की सही तारीखें और पूजा विधि
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गणेश चतुर्थी के तीन दिन बाद महाराष्ट्र में एक खास मेहमान का आगमन होता है, जिन्हें ज्येष्ठा गौरी कहा जाता है। मान्यता है कि लाडले गणपति की मां यानी गौरी (महालक्ष्मी) तीन दिन के लिए अपने बेटे के घर ठहरने आती हैं। पहले दिन उनका धूमधाम से स्वागत होता है, दूसरे दिन पूजा और भोग चढ़ाया जाता है, और तीसरे दिन भावुक माहौल में उन्हें विदा किया जाता है। महाराष्ट्र में इस त्योहार को आदर से 'गौरी-गणपति' कहा जाता है।
शास्त्र के मुताबिक अनुराधा नक्षत्र पर आवाहन, ज्येष्ठ नक्षत्र पर पूजन और मूल नक्षत्र पर विसर्जन किया जाता है। 2026 में गणेश चतुर्थी 14 सितंबर को है, जबकि अनंत चतुर्दशी 25 सितंबर को पड़ रही है। इन्हीं दोनों तारीखों के बीच गौरी के ये तीन दिन आते हैं।
गौरी आवाहन यानी पहला रूप गुरुवार, 17 सितंबर 2026 को होगा। इस दिन अनुराधा नक्षत्र रहेगा और शाम 7:52 बजे से पहले आवाहन करना बेहद शुभ माना जा रहा है। दूसरा दिन यानी गौरी पूजन शुक्रवार, 18 सितंबर 2026 को होगा, जब ज्येष्ठ नक्षत्र रहेगा। इस दिन पूजा दिन में कभी भी की जा सकती है, जबकि दोपहर में महानैवेद्य चढ़ाया जाता है। तीसरे दिन यानी गौरी विसर्जन शनिवार, 19 सितंबर 2026 को होगा, जब मूल नक्षत्र रहेगा और सूर्योदय से दोपहर 3:15 बजे तक विसर्जन किया जा सकता है।
गौरी के आगमन को लेकर दो कहानियां प्रचलित हैं। पहली मान्यता के अनुसार गौरी खुद माता पार्वती का रूप हैं, जो अपने बेटे गणपति के घर तीन दिन के लिए मेहमान बनकर आती हैं और जैसे एक मां की उसके बेटे के घर आवभगत होती है, वैसे ही इन तीन दिनों में उनका ख्याल रखा जाता है। दूसरी कहानी के मुताबिक असुरों के आतंक से परेशान सुहागिन महिलाओं ने भाद्रपद शुक्ल अष्टमी को महालक्ष्मी की प्रार्थना की थी, जिसके बाद देवी ने असुरों का नाश कर महिलाओं का सौभाग्य बचाया। इसी वजह से विदर्भ और मराठवाड़ा में इसे 'महालक्ष्मी पूजन' भी कहा जाता है।
घर में हमेशा दो गौरी मूर्तियां स्थापित की जाती हैं, ज्येष्ठा यानी बड़ी बहन और कनिष्ठा यानी छोटी बहन। लक्ष्मी और अलक्ष्मी दोनों बहनों का आदर करते हुए घर में समृद्धि बनी रहे, इसी भावना से दोनों मूर्तियों की एक साथ पूजा की जाती है।
पहले दिन यानी 17 सितंबर को घर के मुख्य दरवाजे से गौरी के स्थान तक रांगोली से छोटे-छोटे पैरों के निशान बनाए जाते हैं। घर की सुहागिन महिला गौरी की मूर्ति या मुखौटे हाथ में लेकर घर में प्रवेश करती है और रसोई, तिजोरी और पानी की जगह पर रुककर पूछा जाता है, "गौरी किसके पैरों से आई?" इसका जवाब दिया जाता है, "सोने के पैरों से आई, धन-धान्य लेकर आई।" इसके बाद कलश की स्थापना कर गौरी को चावल, सिक्का, हल्दी की गांठ और सुपारी चढ़ाई जाती है। पहली रात बहुत साधारण भोजन यानी सब्जी-भाकरी का भोग लगाया जाता है। दूसरे दिन यानी 18 सितंबर को गौरी को नई साड़ी, चूड़ियां, नथ, मंगलसूत्र, काजल, बिंदी और ताजे फूल, खासकर दूर्वा और गुलाब के गजरे चढ़ाकर सोलह श्रृंगार किया जाता है। इस दिन 16 तरह की पत्तेदार सब्जियां, पुरणपोली, 16 लड्डू, करंजी, चकली, आंबिल और घी-चावल का महानैवेद्य चढ़ाया जाता है। दोपहर या शाम को आसपास की सुहागिन महिलाओं को हल्दी-कुंकू के लिए बुलाया जाता है और रात भर गौरी के गीत गाकर तथा झिम्मा-फुगड़ी जैसे खेल खेलकर जागरण किया जाता है। तीसरे दिन यानी 19 सितंबर को गौरी को दही-चावल का हल्का भोग लगाया जाता है, ठीक वैसे ही जैसे यात्रा पर जाने वाले किसी व्यक्ति को दिया जाता है। सुहागिन महिलाएं एक-दूसरे को और गौरी को हल्दी-कुंकू लगाकर अगले साल जल्दी आने की मन्नत मांगती हैं। धातु या टिकाऊ मुखौटों को सम्भालकर रख दिया जाता है, जबकि मिट्टी की मूर्तियों का विसर्जन कर उनका पानी तुलसी या पेड़ों में डाला जाता है।