मंगलवार, 6 अक्टूबर 2026

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18:00 IST

जन्मठेप में छूट रोकने का अधिकार सिर्फ हाईकोर्ट-सुप्रीम कोर्ट को, सेशन कोर्ट को नहीं: सुप्रीम कोर्ट

लुधियाना ट्रिपल मर्डर केस में सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि सेशन कोर्ट जन्मठेप की सजा दे सकता है, पर उसमें छूट-माफी रोकने का हक सिर्फ हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के पास है।

जन्मठेप में छूट रोकने का अधिकार सिर्फ हाईकोर्ट-सुप्रीम कोर्ट को, सेशन कोर्ट को नहीं: सुप्रीम कोर्ट
एआई से बनाई गई प्रतीकात्मक तस्वीर; यह घटना का वास्तविक फोटो नहीं है | PT24

सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार, 24 सितंबर को एक बड़े मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि सेशन कोर्ट यानी निचली अदालत किसी मर्डर केस के आरोपी को इतने सालों तक छूट या माफी न मिलने वाली जन्मठेप की सजा नहीं सुना सकती, जैसे 20 या 25 साल की गैर-माफी वाली सजा। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि किसी तय अवधि तक सजा माफ न करने या शिक्षा में छूट (रिमिशन) रद्द करने का अधिकार सिर्फ सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के पास है, निचली अदालतों के पास यह अधिकार नहीं है।

यह फैसला दिसंबर 2009 में पंजाब के लुधियाना में एक महिला और उसकी दो नाबालिग बेटियों की ट्रिपल मर्डर केस की सुनवाई के दौरान आया। जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की बेंच ने इस मामले में दोषियों की सजा बरकरार रखी, लेकिन उनकी सजा को 25 साल की सश्रम कैद में बदल दिया।

यह केस नवल किशोर और एक और दोषी से जुड़ा था। लुधियाना में पिंकी नाम की एक महिला, उसकी 8 साल की बेटी दिव्या और 5 साल की बेटी पूजा की हत्या का आरोप नवल किशोर और उसके साथी पर लगा था। इस मामले में निचली अदालत ने उन्हें उम्रकैद की सजा सुनाई थी। फैसला सुनाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कैदी को पूरी उम्र जेल में रखा जा सकता है, लेकिन सेशन कोर्ट कानूनी माफी और सजा में कमी के अधिकारों पर सीमा नहीं लगा सकती।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि संवैधानिक अदालतों को खास तरह की जन्मठेप की सजा में माफी देने का अधिकार है, जो अधिकार सेशन कोर्ट के पास नहीं है। सेशन कोर्ट सीआरपीसी के तहत माफी देने और सजा कम करने के अधिकार को रद्द नहीं कर सकती। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सेशन कोर्ट का ऐसा निर्देश कानूनी सिस्टम के खिलाफ है।

2014 में निचली अदालत ने दोनों आरोपियों को दोषी ठहराते हुए जन्मठेप की सजा सुनाई थी और 2500 रुपए का जुर्माना भी लगाया था। पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने 12 दिसंबर 2022 को दोनों आरोपियों की सजा और दोषसिद्धी बरकरार रखते हुए उनकी अपील खारिज कर दी थी। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने भी भारतीय दंड संहिता की धारा 302 के तहत दोनों याचिकाकर्ताओं की दोषसिद्धी बरकरार रखी, लेकिन उनकी सजा में बदलाव किया।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले के मुताबिक निचली अदालत भारतीय दंड संहिता की धारा 302 और 34 के तहत जन्मठेप की सजा तो सुना सकती थी, लेकिन दोनों दोषियों पर जन्मठेप की खास श्रेणी नहीं लाद सकती थी। सुप्रीम कोर्ट ने निचली अदालत और हाईकोर्ट के आदेश रद्द करते हुए दोनों दोषियों को 25 साल की कैद की सजा सुनाई। कोर्ट ने साफ किया कि इस दौरान वे किसी भी तरह की कानूनी छूट के हकदार नहीं होंगे।

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