मंगलवार, 6 अक्टूबर 2026

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19:12 IST

इस्रायल चुनाव: अरब पार्टियों पर बैन का फैसला, सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई बाकी

इस्रायल की सेंट्रल इलेक्शन कमेटी ने दो बड़ी अरब पार्टियों को 27 अक्टूबर के चुनाव से बाहर करने का फैसला लिया है, मामला अब सुप्रीम कोर्ट में है।

इस्रायल चुनाव: अरब पार्टियों पर बैन का फैसला, सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई बाकी
एआई से बनाई गई प्रतीकात्मक तस्वीर; यह घटना का वास्तविक फोटो नहीं है | PT24

इस्रायल की सियासत में एक बार फिर बड़ा तूफान खड़ा हो गया है। 27 अक्टूबर को होने वाले आम चुनाव से पहले वहां की सेंट्रल इलेक्शन कमेटी ने दो बड़ी अरब पार्टियों और उनके गठबंधन के नेताओं को चुनाव लड़ने से रोकने का बहुत विवादित फैसला लिया है। इस फैसले से इस्रायल में मुस्लिम और अरब समुदाय की राजनीतिक भागीदारी पर सवाल खड़े हो गए हैं, और सियासी हलकों में इसे प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतान्याहू का चुनाव जीतने के लिए बड़ा दांव बताया जा रहा है।

सेंट्रल इलेक्शन कमेटी ने 23 सितंबर को यह फैसला लिया। इस फैसले में मंसूर अब्बास के नेतृत्व वाली पार्टी रा'आम (Ra'am) और हदाश, ता'आल और बलाद को मिलाकर बनी जॉइंट लिस्ट (Joint List) नाम की गठबंधन को चुनाव के दंगल से बाहर करने के लिए वोटिंग हुई। इसके अलावा हदाश पार्टी के सांसद ओफर कासिफ और बलाद पार्टी के मुखिया सामी अबू शेहादेह की व्यक्तिगत उम्मीदवारी पर भी बैन लगाया गया है। हालांकि इस्रायल के चुनावी कानून के हिसाब से यह फैसला अभी फाइनल नहीं माना जाता, क्योंकि इस तरह के बैन को सुप्रीम कोर्ट से आखिरी मंजूरी मिलना जरूरी है।

यह पूरी कार्रवाई बेसिक लॉ: नेसेट (Knesset) के सेक्शन 7ए के तहत की गई है। इस कानून के मुताबिक, अगर कोई पार्टी या उम्मीदवार इस्रायल को यहूदी और लोकतांत्रिक देश मानने से इनकार करता है, समाज में नफरत या नस्लभेद को बढ़ावा देता है, या दुश्मन देश या आतंकी संगठनों के साथ इस्रायल के खिलाफ हथियारबंद लड़ाई का समर्थन करता है, तो उसे चुनाव से बाहर किया जा सकता है।

रा'आम पार्टी के खिलाफ याचिका नेतान्याहू की लिकुड (Likud) पार्टी, दक्षिणपंथी विचारधारा वाली ओत्ज़मा येहुदित पार्टी और एक सामाजिक संगठन ने मिलकर दाखिल की थी। कमेटी ने 18 के मुकाबले 5 वोटों से रा'आम को अयोग्य ठहराया। दूसरी तरफ, जॉइंट लिस्ट के खिलाफ भी लिकुड पार्टी ने ही पहल की थी। बलाद के नेता सामी अबू शेहादेह के खिलाफ 31 के मुकाबले 4 वोटों से बैन का प्रस्ताव पास हुआ। यह फैसला उनके 8 अक्टूबर 2023 के एक लेख के आधार पर लिया गया, जिसमें उन्होंने इस्रायल की पॉलिसी पर आलोचना की थी। हालांकि अबू शेहादेह ने अपने ऊपर हिंसा और आतंकवाद का समर्थन करने के सारे आरोपों को पूरी तरह खारिज कर दिया है।

इस फैसले का इस्रायली राजनीति और खासकर अरब वोटरों की भूमिका पर बड़ा असर पड़ने की आशंका है। 2021 के चुनाव में मंसूर अब्बास की रा'आम पार्टी ने इतिहास बनाते हुए नफ्ताली बेनेट और यायर लैपिड की मिली-जुली सरकार को समर्थन दिया था। इस एक फैसले से बेंजामिन नेतान्याहू की लगातार 12 साल की सत्ता खत्म हो गई थी। इसीलिए अब नेतान्याहू की लिकुड पार्टी किसी भी हालत में अरब पार्टियों को दोबारा किंगमेकर की भूमिका में नहीं आने देना चाहती।

चैनल 12 के हाल के सर्वे के मुताबिक जॉइंट लिस्ट को 7 सीटें और रा'आम पार्टी को 5 सीटें मिलने का अंदाजा लगाया गया है, जबकि नेतान्याहू के मौजूदा गठबंधन को 50 सीटें मिलने की संभावना है। अगर अरब पार्टियों को चुनाव से पूरी तरह बाहर कर दिया जाता है, तो उनकी 12 सीटों का सीधा फायदा किसे होगा, इस पर बड़ी अनिश्चितता है। विरोधी पार्टियों में अरब समर्थन को लेकर पहले से ही मतभेद हैं, इसलिए विश्लेषकों का मानना है कि इस बैन का फायदा आखिर में नेतान्याहू को ही होने की संभावना ज्यादा है।

इस्रायल की सेंट्रल इलेक्शन कमेटी मुख्य रूप से राजनीतिक पार्टियों के प्रतिनिधियों से बनी होती है, इसलिए उसके फैसलों पर सियासी मंशा से प्रेरित होने का आरोप बार-बार लगता रहा है। अब यह पूरा मामला इस्रायल के सुप्रीम कोर्ट में पहुंच गया है और अगले हफ्ते इस पर सुनवाई होगी। सुप्रीम कोर्ट पार्टियों और उम्मीदवारों पर लगे आरोपों की कानूनी कसौटी पर बारीकी से जांच करेगा। इससे पहले भी इलेक्शन कमेटी की तरफ से अरब पार्टियों और उनके नेताओं पर लगाए गए ऐसे बैन को सुप्रीम कोर्ट कई बार रद्द कर चुका है और उन्हें राहत दे चुका है। इसलिए 27 अक्टूबर को होने वाले मतदान में इन अरब पार्टियों और इनके नेताओं के नाम बैलेट पर रहेंगे या नहीं, इसका आखिरी फैसला अब सुप्रीम कोर्ट के हाथ में है।

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