डॉ. बाबासाहेब को डॉक्टरेट देने वाले लंदन स्कूल ऑफ इकॉनॉमिक्स में सांसद डॉ. श्रीकांत शिंदे करेंगे मास्टर्स
कल्याण के सांसद और शिवसेना के संसदीय दल के नेता डॉ. श्रीकांत शिंदे ने लंदन स्कूल ऑफ इकॉनॉमिक्स में मास्टर्स की पढ़ाई शुरू की है, वही संस्थान जिसने डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर को डॉक्टरेट दी थी।
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जिस लंदन स्कूल ऑफ इकॉनॉमिक्स ने संविधान के शिल्पकार डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर को डॉक्टरेट देकर सम्मानित किया था, उसी दुनिया भर में मशहूर संस्थान में अब कल्याण के सांसद और शिवसेना के संसदीय दल के नेता डॉ. श्रीकांत शिंदे मास्टर्स करने जा रहे हैं।
पढ़ाई के पहले ही दिन डॉ. शिंदे लंदन स्कूल ऑफ इकॉनॉमिक्स के कैंपस में मौजूद डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर की मूर्ति पर पहुंचे और उन्हें श्रद्धांजलि दी। इसी के साथ उन्होंने अपने मास्टर्स कोर्स की शुरुआत की। इस मौके पर डॉ. शिंदे ने संकल्प लिया कि इस पढ़ाई से मिलने वाले ज्ञान और अनुभव का इस्तेमाल वे महाराष्ट्र और देश के लिए करेंगे।
डॉ. शिंदे ने बताया कि उन्हें बार-बार डॉ. आंबेडकर की यह बात याद आ रही थी कि शिक्षा शेरनी का दूध है, जो इसे पीता है वह दहाड़ता है। उनका कहना था कि जब वे खुद बाबासाहेब की मूर्ति के सामने खड़े हुए तो इस बात का मतलब उन्हें और गहराई से समझ आया।
डॉ. शिंदे ने कहा कि वहां खड़े होते वक्त उन्हें महाराष्ट्र के सांसद के तौर पर नहीं, बल्कि सबसे पहले एक स्टूडेंट के तौर पर होने का गर्व महसूस हुआ। उन्होंने कहा कि इस पल ने उन्हें एहसास कराया कि सोच और इरादा कितनी दूर तक जा सकते हैं।
डॉ. शिंदे के मुताबिक यह उनकी दूसरी पोस्ट ग्रैजुएट डिग्री है। एम.एस. ऑर्थोपेडिक करने के बाद मेडिकल साइंस ने उन्हें सिखाया कि इलाज कैसे किया जाता है, अब उन्होंने यह कोर्स इसलिए चुना है ताकि वे यह समझ सकें कि पेचीदा आर्थिक सवालों और नीतियों से कैसे निपटा जाए।
उन्होंने साफ किया कि भले ही क्षेत्र अलग है, लेकिन सीखने और जानने की उनकी जिज्ञासा वैसी की वैसी बनी हुई है। उन्होंने यह खुशी भी जताई कि उन्हें एक बार फिर लेक्चर, ग्रुप डिस्कशन और कॉलेज के दिनों जैसी भागदौड़ का अनुभव मिलेगा। उनके मुताबिक इस पढ़ाई का इस्तेमाल महाराष्ट्र और देश के विकास में करने की उत्सुकता उनके अंदर है।
डॉ. शिंदे ने युवाओं को यह संदेश भी दिया कि डिग्री, नौकरी या पद मिल जाने के बाद यह कभी नहीं सोचना चाहिए कि पढ़ाई खत्म हो गई। उन्होंने डॉ. आंबेडकर के इस विचार का हवाला दिया कि इंसान के होने का आखिरी मकसद अपने दिमाग को तराशना होना चाहिए। इसी के साथ उन्होंने 'जेन झी' पीढ़ी को सलाह दी कि दुनिया तेजी से बदल रही है, इसलिए जिज्ञासु बने रहें और लगातार सीखते रहें।