रविवार, 1 नवंबर 2026

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डायबिटीज में भात-आलू पूरी तरह बंद नहीं, पूरी थाली का हिसाब जरूरी: डॉक्टर की सलाह

डायबिटीज में भात-आलू पूरी तरह बंद नहीं, पूरी थाली का हिसाब जरूरी: डॉक्टर की सलाह तस्वीरें सत्यापित नहीं हैं
सेहत PT24 टीम

एन्डोक्रिनोलॉजिस्ट डॉ. अमेय जोशी का कहना है कि डायबिटीज में हर चीज बंद करने की बजाय पूरी थाली का बैलेंस देखना जरूरी है।

भारत में तरह-तरह के त्योहार और स्वादिष्ट खाना खाने का चलन है, लेकिन लगभग हर घर में कोई न कोई ऐसा जरूर होता है जिसे खाने के वक्त मीठा और खास पकवानों से दूर रहने को कहा जाता है। ऐसा इसलिए नहीं कि उसे वो पसंद नहीं, बल्कि इसलिए क्योंकि उसे डायबिटीज है। रोजमर्रा की जिंदगी में भी भात, आलू, मीठा और तला हुआ खाना इसी तरह की चीजों में गिना जाता है। डायबिटीज का पता चलते ही खाने की थाली दो हिस्सों में बंट जाती है, एक जो खाया जा सकता है और दूसरा जो बिल्कुल वर्जित है। लेकिन सवाल यह है कि क्या डायबिटीज में अच्छा खाना खाने का मतलब अपनी पसंद की हर चीज छोड़ देना है।

असल में ऐसा नहीं है, और भारत के आहार से जुड़े ताजा आंकड़े इसे बेहतर समझने में मदद करते हैं। 18,000 से ज्यादा वयस्कों के खाने की आदतों पर हुए 'ICMR-INDIAB' स्टडी में सामने आया कि रोजाना मिलने वाली एनर्जी में से करीब 62 फीसदी कार्बोहाइड्रेट से, 25 फीसदी से ज्यादा फैट से और सिर्फ 12 फीसदी प्रोटीन से मिलती है। इसमें यह भी दिखा कि कार्बोहाइड्रेट का कुल कोटा कम करना जरूरी है। जैसे कि, कार्बोहाइड्रेट की कुल मात्रा बदले बिना सिर्फ प्रोसेस्ड अनाज की जगह पूरा गेहूं या बाजरा/नाचनी लेने से डायबिटीज या पेट बढ़ने जैसी दिक्कतों का खतरा कम नहीं हुआ। मतलब एक चीज की जगह दूसरी चीज खा लेना काफी नहीं है, असली बात है पूरी थाली की प्लानिंग।

डायबिटीज का मरीज अपने डॉक्टर या डायटीशियन से इस पर बात कर सकता है कि खाने में भात या रोटी के साथ दाल, कडधान्य, दही, पनीर, अंडा या प्रोटीन के दूसरे सही सोर्स शामिल किए जा सकते हैं या नहीं, और उसमें सब्जियां व फाइबर पर्याप्त हैं या नहीं। यह सवाल इसलिए मायने रखते हैं क्योंकि पूरे देश में खाने का तरीका अलग-अलग है। 'ICMR-INDIAB' के एनालिसिस में अलग-अलग इलाकों और गांव-शहर की आबादी के खाने में फर्क पाया गया, प्रोटीन लेने की मात्रा भी अलग-अलग थी। इससे यह साबित होता है कि एक मरीज के लिए बताया गया आहार दूसरे मरीज पर लागू नहीं होता। किसी भी खाने को सख्ती से 'डायबिटीज के लिए सही' या 'गलत' नहीं ठहराया जा सकता। पसंदीदा चीज थाली में जगह पा सकती है, बस यह उसकी मात्रा, कितनी बार खाई जाती है, किसके साथ खाई जाती है और मरीज की ओवरऑल हेल्थ पर निर्भर करता है।

डायबिटीज सिर्फ ब्लड शुगर का मामला नहीं है। जब मोटापा और डायबिटीज साथ में हों तो यह बात और अहम हो जाती है। ऐसे मरीज के लिए डॉक्टर सिर्फ ग्लूकोज लेवल नहीं, बल्कि भूख, पेट भरने का एहसास, कुल एनर्जी इनटेक, वजन, शारीरिक हलचल और यह भी देखते हैं कि मरीज खाने में किए बदलाव को लंबे समय तक निभा पाएगा या नहीं। बहुत सख्त डाइट प्लान लंबे समय तक टिकने की संभावना कम होती है।

डायबिटीज एक लंबे समय तक चलने वाली बीमारी है और इलाज समय के साथ बदल सकता है। कुछ मरीजों के लिए गोलियां, इंसुलिन या सेमाग्लुटाइड जैसे GLP-1 रिसेप्टर एगोनिस्ट दवाओं का हिस्सा हो सकते हैं। इलाज आसान बनाने के लिए हफ्ते में एक बार इंजेक्शन के ऑप्शन भी उपलब्ध हैं। दवाएं मरीज की जरूरत के हिसाब से तय होनी चाहिए, साथ में लाइफस्टाइल में बदलाव भी जारी रखने चाहिए।

डॉ. अमेय जोशी की सलाह है कि किसी एक चीज की बजाय पूरे खाने पर ध्यान दें, सब्जी, सही प्रोटीन, नैचुरल कार्बोहाइड्रेट और हेल्दी फैट का बैलेंस रखें। मात्रा का ध्यान रखें क्योंकि हेल्दी चीजों से भी कैलोरी और कार्बोहाइड्रेट मिलते हैं। दूसरों की डाइट कॉपी न करें, हर मरीज की उम्र, वजन, दवाएं, फिजिकल एक्टिविटी, दूसरी बीमारियां अलग होती हैं। रोज ब्लड ग्लूकोज चेक करें ताकि डाइट, एक्सरसाइज और इलाज में बदलाव का असर समझ आए। "मुझे क्या नहीं खाना चाहिए" पूछने की बजाय डॉक्टर से बात करके ऐसी डाइट बनवाएं जो शरीर और लाइफस्टाइल के हिसाब से हो और लंबे समय तक निभाई जा सके।

यह जानकारी डॉ. अमेय जोशी, सलाहकार एन्डोक्रिनोलॉजिस्ट, भक्तिवेदांत हॉस्पिटल एंड रिसर्च इंस्टिट्यूट (एन्डोक्राइन और डायबिटीज क्लिनिक) ने दी है।

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