चेंबूर के 'सम्राट' गणेश मंडल में 22वें साल नवगुंजरा की अनोखी झांकी आकर्षण का केंद्र
मुंबई के चेंबूर इलाके में शिव शक्ती गणेशोत्सव मंडल यानी 'चेंबूर का सम्राट' ने इस बार पौराणिक नवगुंजरा रूप की झांकी सजाई है, जो 22 साल की परंपरा का जश्न मना रही है।
मुंबई में गणेशोत्सव का उत्साह अपने पूरे शबाब पर है, और इसी बीच चेंबूर का मशहूर शिव शक्ती गणेशोत्सव मंडल, जिसे लोग 'चेंबूर का सम्राट' के नाम से जानते हैं, वहां भी बप्पा विराजमान हो चुके हैं। मंडल इस बार अपने गणेशोत्सव का 22वां साल भक्तिभाव और जोश के साथ मना रहा है। पिछले 22 सालों से चली आ रही परंपरा और भक्तों की श्रद्धा की वजह से 'चेंबूर का सम्राट' आसपास के गणेशभक्तों के लिए एक बड़ा आकर्षण बन गया है।
इस बार के उत्सव में 'नवगुंजरा' नाम की एक खास पौराणिक संकल्पना को खास जगह दी गई है। नवगुंजरा मुख्य रूप से ओडिशा की धार्मिक-सांस्कृतिक परंपरा से जुड़ा एक अनोखा मिला-जुला रूप है। अलग-अलग जानवरों और पक्षियों के शरीर के हिस्सों से बना यह रूप विष्णु-कृष्ण के दैवी स्वरूप से जोड़ा जाता है। इस संकल्पना के जरिए 'रूप अनेक, तत्त्व एक' का संदेश दिया गया है, यानी बाहर से रूप चाहे जितने अलग-अलग हों, उसके पीछे का दैवी तत्त्व एक ही होता है।
नवगुंजरा की मशहूर कहानी ओडिया कवि सरला दास के ओडिया महाभारत में मिलती है। कहानी के मुताबिक अर्जुन जब तपस्या कर रहे थे, तब उनके सामने एक ऐसा अजीब प्राणी रूप प्रकट हुआ जो उन्होंने पहले कभी नहीं देखा था। यह रूप देखकर अर्जुन शुरू में सतर्क हो जाते हैं और धनुष उठा लेते हैं। लेकिन जब उन्हें एहसास होता है कि इस अनोखे रूप के पीछे कोई साधारण जीव नहीं बल्कि दैवी शक्ति है, तो वे हथियार नीचे रख देते हैं और उस रूप के आगे नतमस्तक हो जाते हैं। यह भी ध्यान देने वाली बात है कि नवगुंजरा की यह कहानी वेदव्यास के मूल संस्कृत महाभारत में नहीं मिलती, बल्कि यह सरला दास के ओडिया महाभारत से जुड़ी है।
जैसा कि नाम से ही पता चलता है, 'नवगुंजरा' के रूप में कई अलग-अलग जीवों के अंग एक साथ जुड़े हुए दिखते हैं। अलग-अलग चित्रणों में तफसील थोड़ी अलग हो सकती है, लेकिन प्रचलित ओडिया शैली में इसमें मुर्गे का सिर, मोर की गर्दन, बैल का कूबड़, शेर की कमर, सांप की पूंछ, और हाथी-बाघ-हिरण या घोड़े जैसे जानवरों के पैर शामिल होते हैं। एक हाथ में कमल भी थामा हुआ दिखाया जाता है। इसी वजह से नवगुंजरा को सिर्फ एक अजीब प्राणी की तस्वीर न मानकर, विविधता में से झलकने वाले एक दैवी तत्त्व का प्रतीक माना जाता है।
ओडिशा की धार्मिक और कलात्मक परंपरा में नवगुंजरा का खास स्थान है, खासकर श्रीजगन्नाथ परंपरा और वहां की मशहूर पट्टचित्र कला में इसका चित्रण देखने को मिलता है। रंग-बिरंगी और बारीक कारीगरी से इस दैवी रूप को उकेरने की एक लंबी परंपरा रही है।
शिव शक्ती गणेशोत्सव मंडल के 22 साल के इस सफर ने चेंबूर इलाके में उत्सव की एक अलग पहचान बना दी है। बप्पा के दर्शन, आकर्षक सजावट और इस धार्मिक-सांस्कृतिक संकल्पना के जरिए इस बार भक्तों को कुछ अलग अनुभव देने की कोशिश की गई है। '22 साल की श्रद्धा, 22 साल की परंपरा और 22 साल का चेंबूर का सम्राट' इसी भावना के साथ मंडल का इस साल का गणेशोत्सव मनाया जा रहा है। 'नवगुंजरा' के जरिए अनेकता में एकता, हर रूप में मौजूद दैवी अस्तित्व, और भारतीय पौराणिक-कला परंपरा की पहचान भक्तों के सामने रखी जा रही है।