बिना पानी के आग बुझाएगी साउंड वेव्स, हिमाचल के छात्रों का अनोखा डिवाइस
हिमाचल प्रदेश के मंडी जिले में सुंदरनगर सरकारी पॉलिटेक्निक के इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग स्टूडेंट्स ने ऐसा फायर एक्स्टिंग्विशर बनाया है जो पानी, फोम या केमिकल के बिना सिर्फ ध्वनि तरंगों से आग बुझाता है।
हिमाचल प्रदेश के मंडी जिले में सुंदरनगर के सरकारी पॉलिटेक्निक कॉलेज से एक दिलचस्प इनोवेशन सामने आया है। यहां इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग के फाइनल ईयर के स्टूडेंट्स ने एक ऐसा 'ऑटोमैटिक सोनिक फायर एक्स्टिंग्विशर' तैयार किया है जो ध्वनि तरंगों की मदद से आग बुझाता है। खास बात यह है कि इस डिवाइस में पानी, फोम या किसी भी तरह के केमिकल फायर फाइटिंग मैटीरियल की जरूरत नहीं पड़ती।
स्टूडेंट्स का कहना है कि इस प्रोजेक्ट को बनाने का मकसद इलेक्ट्रिकल उपकरणों को आग बुझाते वक्त होने वाले नुकसान से बचाना है। आम तौर पर जो फायर एक्स्टिंग्विशर इस्तेमाल होते हैं उनमें पानी या केमिकल की वजह से सर्वर, इलेक्ट्रॉनिक सर्किट और महंगे उपकरण खराब हो जाते हैं। लेकिन सोनिक टेक्नोलॉजी में आग बुझने के बाद कोई भी केमिकल अवशेष नहीं बचता, यानी उपकरणों को कोई नुकसान नहीं होता।
इस डिवाइस में सेंसर, माइक्रोकंट्रोलर, डिजिटल लॉजिक कंट्रोलर और हाई-पावर एम्प्लिफायर लगाए गए हैं। जैसे ही सेंसर आग को डिटेक्ट करता है, सिस्टम एक तय फ्रीक्वेंसी की ध्वनि तरंगें पैदा करने लगता है। स्टूडेंट्स के इस प्रोटोटाइप में 30 से 60 Hz के बीच की साउंड वेव्स का इस्तेमाल किया गया है।
यह तरंगें हवा में कंपन पैदा करती हैं, जिससे आग के आसपास मौजूद ऑक्सीजन की मूवमेंट पर असर पड़ता है। इससे ज्वालाओं को मिलने वाली ऑक्सीजन की सप्लाई कम हो जाती है और आग बुझने में मदद मिलती है। आसान भाषा में कहें तो ध्वनि तरंगों के जरिए आग के चारों तरफ एक तरह की 'हवा की दीवार' खड़ी की जाती है, जिससे आग को फैलने से रोका जाता है।
फिलहाल इस डिवाइस की कीमत करीब 7,000 से 8,000 रुपये बताई जा रही है। वजन में हल्का होने की वजह से इसे दूर-दराज के इलाकों में भी आसानी से ले जाया जा सकता है। स्टूडेंट्स का प्लान है कि आगे चलकर इसका इस्तेमाल डेटा सेंटर, सर्वर रूम, लैब्स के साथ-साथ जंगल की आग बुझाने में भी किया जाए।
अभी यह सिर्फ एक प्रोटोटाइप है और इसे और कॉम्पैक्ट व पावरफुल बनाने का काम चल रहा है। इस प्रोजेक्ट के लिए पेटेंट लेने की तैयारी भी की जा रही है। स्टूडेंट्स इस इनोवेशन को सिर्फ कॉलेज प्रोजेक्ट तक सीमित न रखकर इसे कमर्शियल प्रोडक्ट बनाने की कोशिश में जुटे हैं।