आसमान में संकट आए तो पायलट क्या करते हैं, CPL ट्रेनिंग से सैलरी तक पूरी जानकारी
कैप्टन स्मित मच्छार की चर्चा के बीच जानिए कि भारत में पायलट कैसे बनते हैं, ट्रेनिंग में क्या सिखाया जाता है और सैलरी कितनी हो सकती है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी समेत दुनिया भर से कैप्टन स्मित मच्छार (Smit Machchhar) की तारीफ हो रही है। उनकी कामगिरी को देखते हुए महाराष्ट्र से पहली बड़ी मांग उठी है कि उन्हें बेमिसाल बहादुरी के लिए 'अशोक चक्र' दिया जाए, जो भारत का सबसे बड़ा शांतिकाल का वीरता पुरस्कार है। इसी बहाने सवाल उठता है कि पायलट आखिर तैयार कैसे होते हैं और ट्रेनिंग में उन्हें क्या सिखाया जाता है।
हजारों फुट की ऊंचाई पर उड़ रहे विमान में अचानक तकनीकी खराबी आ जाए, इंजन में दिक्कत हो जाए या खराब मौसम की वजह से बाहर कुछ दिखना बंद हो जाए, तो चंद सेकंड में लिया गया फैसला सैकड़ों यात्रियों की सुरक्षा के लिए अहम हो सकता है। इसीलिए कमर्शियल पायलटों को सिर्फ विमान उड़ाना नहीं सिखाया जाता। उन्हें इमरजेंसी में तय प्रक्रिया के हिसाब से फैसला लेने की सख्त ट्रेनिंग भी दी जाती है।
भारत में Commercial Pilot Licence (CPL) पाने के लिए उम्मीदवार को DGCA की तय की हुई पात्रता और ट्रेनिंग की शर्तें पूरी करनी पड़ती हैं। अगर किसी ने साइंस से बारहवीं नहीं की है, तो Physics और Mathematics मान्यता प्राप्त बोर्ड से पूरा करने का विकल्प हो सकता है। अर्जी देने से पहले DGCA के ताजा नियम जरूर देख लेने चाहिए। मेडिकल फिटनेस भी बहुत जरूरी है। नजर, सुनने की क्षमता, दिल और पूरी सेहत की जांच होती है, और ट्रेनिंग व लाइसेंस के अलग-अलग पड़ावों पर DGCA medical assessment पूरा करना पड़ता है।
फ्लाइंग ट्रेनिंग CPL का अहम हिस्सा है। DGCA के नियम के मुताबिक CPL के लिए आम तौर पर कम से कम 200 घंटे का flying experience चाहिए। इसमें तय solo, cross-country, instrument और दूसरी flying की शर्तें पूरी करनी होती हैं। साथ ही Air Navigation, Aviation Meteorology, Air Regulations और विमान से जुड़े तकनीकी विषय पढ़कर जरूरी परीक्षाएं पास करनी पड़ती हैं।
ट्रेनिंग की शुरुआत ग्राउंड स्कूल से होती है। वहां सिखाया जाता है कि विमान कैसे काम करता है, मौसम का उड़ान पर क्या असर पड़ता है, नेविगेशन कैसे होता है, हवाई ट्रैफिक के नियम क्या हैं और विमान की अलग-अलग तकनीकी प्रणालियां कैसे चलती हैं। इसके बाद Instrument Flying बहुत अहम हो जाती है। रात के अंधेरे, घने कोहरे या खराब मौसम में जब बाहर का नजारा सीमित हो, तब प्रशिक्षित पायलट instruments और तय procedures के सहारे विमान को काबू में रखना सीखता है।
simulator training भी ट्रेनिंग के सबसे जरूरी हिस्सों में है। असली विमान और यात्रियों को खतरे में डाले बिना सिम्युलेटर में तरह-तरह की इमरजेंसी का अभ्यास हो जाता है। इंजन में खराबी, आग या धुआं, खराब मौसम, instrument failure और दूसरी abnormal या emergency हालत बनाकर crew से सही procedure का बार-बार अभ्यास कराया जाता है। इससे असली संकट में पायलट checklist, cockpit coordination और decision-making का असरदार इस्तेमाल कर पाता है।
आज की हवाई सेवा में Crew Resource Management (CRM) अहम है। इसमें कैप्टन और फर्स्ट ऑफिसर के बीच बातचीत, workload management, हालात की समझ, फैसला लेने की क्षमता और ATC से तालमेल पर जोर रहता है। एयरलाइन पायलटों को विमान के प्रकार के हिसाब से type rating और कंपनी की ट्रेनिंग भी पूरी करनी पड़ती है। इसके बाद भी ट्रेनिंग खत्म नहीं होती। नियमित recurrent training और proficiency checks से उनके हुनर की जांच होती रहती है।
पायलट की सैलरी एयरलाइन, अनुभव, seniority, विमान के प्रकार, domestic या international operations और कॉन्ट्रैक्ट पर काफी हद तक निर्भर करती है। इसलिए यह Rs 50 हजार से Rs 15 लाख प्रतिमाह तक हो सकती है। असल सैलरी एयरलाइन, अनुभव और विमान के प्रकार जैसी बातों से अलग-अलग होती है।
ट्रेनिंग पूरी होते ही कोई सीधे कैप्टन नहीं बन जाता। आम तौर पर First Officer के तौर पर अनुभव लेने के बाद जरूरी flying experience, airline requirements, command training और checks पूरे करने पर पायलट को Captain या Commander बनने का मौका मिलता है।