आगरी समाज में भाद्रपद की साखरचौथ पर मनाया जाता है खास गणपती
मुंबई, ठाणे, पालघर, रायगड और नवी मुंबई के आगरी समाज में गणेशोत्सव के बाद संकष्टी चतुर्थी को घर में गणपती बिठाने की परंपरा साखरचौथ के नाम से जानी जाती है।
गणेशोत्सव का नाम आते ही ज्यादातर लोगों को बप्पा के आगमन से लेकर विसर्जन तक का माहौल याद आता है, लेकिन महाराष्ट्र के कुछ समाज और इलाकों में गणपती से जुड़ी अपनी अलग स्थानीय परंपराएं आज भी चली आ रही हैं। इन्हीं में से एक है भाद्रपद महीने की साखरचौथ का गणपती। मुंबई, ठाणे, पालघर, रायगड और नवी मुंबई के आसपास रहने वाले आगरी समाज में इस गणपती को खासा पारंपरिक महत्व दिया जाता है।
साखरचौथ गणपती की शुरुआत की कहानी पेण और आसपास के इलाकों के गणेश मूर्तिकारों से जुड़ी है। भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी पर होने वाले मुख्य गणेशोत्सव के दिनों में आगरी समाज के कई मूर्तिकार, कारखाना मालिक और मजदूर मूर्तियां बेचने या उनकी डिलीवरी के काम में गांव से बाहर रहते थे। ऐसे में मुख्य त्योहार के दिन खुद के घर गणपती बिठाना या सार्वजनिक उत्सव में शामिल होना इनके लिए मुमकिन नहीं होता था। इसीलिए मुख्य गणेशोत्सव खत्म होने के बाद, यानी अनंत चतुर्दशी के बाद, भाद्रपद महीने के कृष्ण पक्ष की संकष्टी चतुर्थी को - जिसे साखरचौथ कहा जाता है - ये मूर्तिकार और मजदूर अपने घर गणपती लाकर उत्सव मनाने लगे। इस साल साखरचौथ का गणपती संकष्टी चतुर्थी के दिन यानी मंगलवार, 29 सितंबर को आएगा और अगले दिन बुधवार, 30 सितंबर को इसका विसर्जन होगा।
भाद्रपद महीने की शुक्ल पक्ष चतुर्थी को गणेश चतुर्थी मनाई जाती है। इसके बाद आने वाली चतुर्थी से जुड़ी कुछ स्थानीय परंपराओं में साखरचौथ का गणपती मनाया जाता है। आगरी समाज के कुछ परिवारों में इस दिन गणपती की स्थापना या पूजा करने की परंपरा देखी जाती है। 'साखरचौथ' नाम के पीछे स्थानीय बोली, रीति-रिवाज और नैवेद्य से जुड़ी अलग-अलग मान्यताएं बताई जाती हैं, इसलिए यह परंपरा गांव, परिवार और स्थानीय रिवाज के हिसाब से अलग-अलग रूप में देखने को मिलती है।
आगरी समाज का इतिहास समुद्र किनारे, खेती, मिठागरों और स्थानीय गांव की जिंदगी से जुड़ा रहा है। ठाणे, पालघर, रायगड और मुंबई के आसपास रहने वाले आगरी समाज ने अपने कई पुराने सण-त्योहारों के तौर-तरीके आज भी सहेज कर रखे हैं। साखरचौथ का गणपती भी इन्हीं स्थानीय धार्मिक परंपराओं में गिना जाता है। कुछ आगरी परिवारों में गणपती की पूजा घर की कुलपरंपरा और पूर्वजों से चली आ रही रीत के हिसाब से की जाती है।
आगरी समाज की पारंपरिक खान-पान संस्कृति का असर त्योहार के नैवेद्य पर भी दिखता है। साखरचौथ के गणपती को घर पर बने मीठे पकवान, फल और पारंपरिक चीजें नैवेद्य के तौर पर चढ़ाई जाती हैं। हालांकि हर घर में नैवेद्य एक जैसा हो, ऐसा जरूरी नहीं - स्थानीय उपलब्धता और परिवार की परंपरा के हिसाब से इसमें फर्क होता रहता है।
साखरचौथ का गणपती सिर्फ एक धार्मिक विधि नहीं, बल्कि आगरी समाज की लोकपरंपराओं, श्रद्धा और सांस्कृतिक पहचान से जुड़ा हुआ है। पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रही ऐसी प्रथाओं को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का काम परिवार और समाज के बुजुर्ग करते आए हैं। आज शहरीकरण के चलते जीवनशैली में बड़े बदलाव आए हैं, फिर भी ठाणे, नवी मुंबई, रायगड और आसपास के इलाकों के कुछ आगरी परिवारों में यह स्थानीय परंपरा श्रद्धा के साथ निभाई जाती है। गणपती की भक्ति महाराष्ट्र के हर हिस्से में अलग-अलग रूप में दिखती है, और आगरी समाज का साखरचौथ गणपती भी इसी विविधता की एक झलक है, जिसमें मुख्य गणेशोत्सव के साथ-साथ स्थानीय परंपराओं को भी सहेजा जाता है।