2 BHK फ्लैट के इंटीरियर पर कितना खर्च आता है और बजट किन बातों से बदलता है
तस्वीरें सत्यापित नहीं हैं
मटीरियल, स्टोरेज, किचन, लाइटिंग और रिनोवेशन के साथ शहर भी तय करता है 2 BHK इंटीरियर का खर्च। अलग-अलग काम के अनुमानित दाम और बजट बचाने के तरीके।
खाली नक्शे में 2 BHK घर खुला-खुला लगता है, लेकिन अलमारी, बेड, सोफा और किचन के कैबिनेट लगते ही तस्वीर बदल जाती है। कभी बेडरूम का दरवाज़ा सीधे अलमारी से टकराने लगता है, तो कभी लिविंग रूम उम्मीद से तंग लगता है। इसीलिए अनुभवी इंटीरियर डिज़ाइनर डिज़ाइन फाइनल करने से पहले ऐसी छोटी बातें परख लेते हैं। मकसद यही रहता है कि घर आरामदेह और काम का बने और खर्च काबू में रहे।
बजट कितना बैठेगा, यह कई चीज़ों पर टिका है। हर घर में एक जैसा काम नहीं होता। हाल ही में हैंडओवर हुए अपार्टमेंट में शायद सिर्फ ज़रूरी फिटिंग लगवानी पड़े, जबकि पुराने मकान में बिजली के बदलाव, मरम्मत और नई फिनिशिंग भी करानी पड़ सकती है।
घर का साइज़ और लेआउट पहली बात है। बड़े कमरों में मटीरियल और फर्नीचर ज़्यादा लगता है, और टेढ़े कोने या ऊबड़-खाबड़ दीवारों के लिए अलग से कस्टम काम करना पड़ सकता है। मटीरियल में लैमिनेट फिनिश आमतौर पर प्रीमियम वीनियर या एक्रेलिक फिनिश से सस्ती पड़ती है। कब्ज़े, दराज़ के चैनल और हैंडल की क्वालिटी भी दाम पर असर डालती है।
फुल-हाइट अलमारी, लॉफ्ट कैबिनेट और बिल्ट-इन शेल्फ जगह का अच्छा इस्तेमाल करते हैं, पर उनमें मटीरियल और फिटिंग का खर्च बढ़ता है। एक्स्ट्रा सॉकेट, छुपी हुई वायरिंग और कई परतों वाली लाइटिंग भी बिल बढ़ाती हैं, खासकर जब पुराने पॉइंट खिसकाने पड़ें। फ्लोरिंग बदलने या प्लंबिंग और बिजली का लेआउट बदलने से बजट काफ़ी बढ़ सकता है। इसलिए सजावट वाली चीज़ें चुनने से पहले यह समझ लेना ज़रूरी है कि घर को असल में किस चीज़ की ज़रूरत है।
शहर का भी फ़र्क पड़ता है। डिज़ाइन एक जैसा हो, तब भी अलग-अलग शहरों में काम का दाम अलग बैठ सकता है, क्योंकि मज़दूरी, मटीरियल की उपलब्धता, ढुलाई और इंस्टॉलेशन की हालत सब मायने रखते हैं। बेंगलुरु के जिन परिवारों को घर से काम के लिए अलग डेस्क चाहिए, उनके लिए ठीक से बनाया गया वर्क-फ्रॉम-होम कोना काफ़ी मददगार होता है। मुंबई में कमरे छोटे होते हैं, इसलिए समझदारी से बनी अलमारियां और बहुउपयोगी फर्नीचर काम आते हैं। दिल्ली, चेन्नई, हैदराबाद और पुणे में इंटीरियर डिज़ाइनरों के साथ काम करने वालों के सामने अपनी स्थानीय बातें आ सकती हैं।
अपार्टमेंट में पहुंच भी देखनी पड़ती है। लिफ्ट पर पाबंदी, सोसायटी की इजाज़त और काम के सीमित घंटे डिलीवरी और इंस्टॉलेशन का शेड्यूल बदल सकते हैं। इसलिए कोटेशन की तुलना सिर्फ़ आख़िरी रकम देखकर नहीं, बल्कि उसमें शामिल काम देखकर करनी चाहिए।
अनुमानित खर्च कुछ यूं है: मॉड्यूलर किचन पर 1.5 से 3.5 लाख रुपये, जो कैबिनेट के साइज़, फिनिश, हार्डवेयर और एक्सेसरीज़ पर निर्भर है। अलमारियों पर 80,000 से 2 लाख रुपये, जो यूनिट की गिनती, अंदर की फिटिंग और शटर के मटीरियल पर टिका है। लिविंग रूम पर 75,000 से 2 लाख रुपये, जिसमें टीवी यूनिट, स्टोरेज, बैठने का इंतज़ाम और फीचर वॉल आती हैं। बेडरूम पर 1 से 2.5 लाख रुपये, जिसमें बेड, साइड टेबल, अलमारी और स्टडी डेस्क शामिल हैं। लाइटिंग और सीलिंग पर 40,000 से 1.2 लाख रुपये, और पेंटिंग व फिनिशिंग पर 25,000 से 60,000 रुपये, जो सतह की तैयारी, पेंट की क्वालिटी और मरम्मत पर निर्भर है।
बेसिक इंटीरियर का अनुमान आमतौर पर ज़रूरी फिटिंग और काम के स्टोरेज तक सीमित रहता है। फुल इंटीरियर तब महंगा पड़ सकता है जब उसमें खास बनवाया फर्नीचर, प्रीमियम फिनिश और भारी सजावट जुड़ जाए। दोनों में से कोई भी तय दाम नहीं है। आख़िरी अनुमान घर की हालत और तय हुए काम पर टिका रहता है।
डिज़ाइन घर में रहने वालों की ज़रूरत के हिसाब से होना चाहिए, सिर्फ़ फोटो में अच्छा दिखने के लिए नहीं। छोटे बच्चों वाले माता-पिता को स्टोरेज तक आसान पहुंच और बच्चों के खेलने लायक सुरक्षित फर्नीचर चाहिए होगा। बुज़ुर्गों के लिए सुरक्षित रास्ते और ठीक रोशनी अच्छी रहती है। पालतू जानवर वालों को टिकाऊ सतह और आसानी से साफ़ होने वाले कपड़े पसंद आ सकते हैं। बोनिटो डिज़ाइन्स की लाइफ डिज़ाइन सोच इसी बात पर ज़ोर देती है कि परिवार कैसे रहता है और उसे हर जगह से क्या चाहिए।
फ़ालतू खर्च से बचने के लिए कुछ फ़ैसले शुरू में ही कर लेने चाहिए। पहले किचन, अलमारी, लाइटिंग जैसी रोज़ काम आने वाली चीज़ों के लिए बजट रखें, फिर सजावट की सोचें। डिज़ाइन जल्दी फाइनल करें, क्योंकि कैबिनेट बनना शुरू होने के बाद साइज़ या फिनिश बदलने पर एक्स्ट्रा चार्ज और देरी हो सकती है। प्लान किए गए बजट का करीब 10-15% अलग रखें, ताकि साइट पर अचानक आई दिक्कत या ज़रूरी बदलाव निपटाए जा सकें। यह भी देख लें कि खुला फर्नीचर, अप्लायंसेज़, पर्दे और सजावटी लाइटें कोटेशन में शामिल हैं या नहीं, क्योंकि इनसे कुल खर्च में साफ़ फ़र्क आता है।
कोटेशन मंज़ूर करने से पहले हर कमरे का अलग हिसाब, मटीरियल की स्पेसिफिकेशन, कंस्ट्रक्शन ड्रॉइंग, पेमेंट का शेड्यूल और डिलीवरी का वक़्त मांगना चाहिए। वारंटी की शर्तें और अपवाद भी उतने ही ध्यान से पढ़ें। कॉस्ट कैलकुलेटर घर के साइज़, चुने गए कमरों और मटीरियल के आधार पर बजट का अंदाज़ा दे देता है, पर वह साइट की सारी हालत और कस्टमाइज़ेशन नहीं जोड़ पाता। बेहतर होगा कि योजना कब्ज़ा मिलने या रिनोवेशन शुरू होने से पहले ही शुरू हो, ताकि नाप, लेआउट, मटीरियल और बजट तय करने का पूरा वक़्त मिले।
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