सरदार पटेल की जयंती पर राष्ट्रीय एकता दिवस, आज के भारत में एकता की नई चुनौती
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31 अक्टूबर को मनाए जाने वाले राष्ट्रीय एकता दिवस पर सरदार वल्लभभाई पटेल की विरासत और आज के भारत में एकता बनाए रखने की चुनौती पर एक नज़र।
नई दिल्ली, 31 अक्टूबर 2026: नक्शे पर सरहदें खींच देने भर से राष्ट्रीय एकता पक्की नहीं हो जाती। यह इस पर टिकी है कि अलग-अलग इलाकों, भाषाओं और समुदायों के लोग खुद को एक साझा राजनीतिक और सामाजिक सफर का हिस्सा मानते हैं या नहीं। आज़ादी के बाद से भारत के लिए यह चुनौती काफी बदल चुकी है। रियासतों के विलय से देश की जमीनी बुनियाद तो पड़ गई, लेकिन तेज़ आर्थिक बदलाव, क्षेत्रीय आकांक्षाओं और बदलती सामाजिक उम्मीदों के बीच एकता को कायम रखने का काम आज भी जारी है। राष्ट्रीय एकता दिवस इस बात को परखने का मौका देता है कि सरदार वल्लभभाई पटेल की विरासत आज के भारत की चुनौतियों में कैसे काम आ सकती है।
राष्ट्रीय एकता दिवस हर साल 31 अक्टूबर को सरदार वल्लभभाई पटेल की जयंती पर मनाया जाता है। वे देश के आज़ादी के आंदोलन में और आज़ादी के बाद रियासतों के विलय में अहम भूमिका में थे। भारत सरकार ने उनके योगदान को मान देने और एकता, अखंडता व सुरक्षा के प्रति देश की प्रतिबद्धता दोहराने के लिए 2014 में यह दिन शुरू किया। रन फॉर यूनिटी, एकता की शपथ और सार्वजनिक कार्यक्रमों के जरिए यह संदेश आम लोगों तक पहुंचता है।
इस तरह यह दिन सिर्फ याद करने की रस्म नहीं है। यह सोचने का मौका देता है कि देश की एकजुटता की नींव क्या है और उसे बचाए रखने की जिम्मेदारी क्या है। देश जब बड़े आर्थिक और तकनीकी लक्ष्यों की ओर बढ़ रहा है, तब एकता वह जरूरी शर्त है जिससे राष्ट्रीय आकांक्षाएं साझा तरक्की में बदल सकें।
1947 के हालात में राजनीतिक एकीकरण फौरी जरूरत बन गया था। आज़ादी से अंग्रेजों का राज खत्म हुआ, पर सैकड़ों रियासतों को तय करना था कि नए बनते संघ से उनका रिश्ता क्या होगा। बिखरे हुए राजनीतिक नक्शे की जगह एक चलता-फिरता देश बनाने के लिए उनका विलय जरूरी था।
भारत के पहले उप प्रधानमंत्री और गृह मंत्री के तौर पर सरदार पटेल ने इस प्रक्रिया में अगुवाई की। उन्होंने वी. पी. मेनन और दूसरे अफसरों के साथ मिलकर काम किया। बातचीत और राजनीतिक समझाइश से ज्यादातर रियासतें भारत में शामिल हुईं, हालांकि कुछ मामलों में ज्यादा जटिल कदम उठाने पड़े। इस उपलब्धि में कई लोगों और संस्थाओं का हाथ था, पर नतीजे में पटेल का इरादा और उनकी राजनीतिक समझ केंद्र में थी।
उनके योगदान से एक टिकाऊ सिद्धांत निकला: राष्ट्रीय एकता के लिए ऐसा राजनीतिक नेतृत्व चाहिए जो अलग-अलग हितों को एक साझा ढांचे में साध सके। आज के भारत के हालात अलग हैं, पर विविधता और साझा मकसद के बीच संतुलन की जरूरत आज भी बनी हुई है।
आज की चुनौती रियासतों को जोड़ने की नहीं, बल्कि यह पक्का करने की है कि तेज़ राष्ट्रीय विकास से लोगों को साझा तरक्की का एहसास हो। बड़ी इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाएं, बेहतर परिवहन, डिजिटल कनेक्टिविटी और बढ़ते आर्थिक मौके दूर-दराज के इलाकों को राष्ट्रीय बाजारों और संस्थाओं से करीब से जोड़ सकते हैं। मिसाल के तौर पर सरहदी इलाकों और पूर्वोत्तर में कनेक्टिविटी परियोजनाओं का असर आवाजाही और सुरक्षा के साथ-साथ सेवाओं तक पहुंच और आर्थिक भागीदारी पर भी पड़ता है।
फिर भी अकेला विकास एकजुटता की गारंटी नहीं है। रोजगार, शिक्षा, सार्वजनिक सेवाओं और निवेश में क्षेत्रीय फर्क इस पर असर डाल सकता है कि नागरिक संघ को कैसे महसूस करते हैं। इसलिए भरोसेमंद राष्ट्रीय नजरिए में आर्थिक महत्वाकांक्षा के साथ स्थानीय जरूरतों पर ध्यान भी होना चाहिए। जब लोग अपनी जिंदगी में ठोस सुधार देखते हैं और सार्वजनिक संस्थाओं पर भरोसा करते हैं, तब साझा राष्ट्रीय प्रोजेक्ट का हिस्सा होने का मतलब ज्यादा गहरा हो जाता है।
यहीं सहकारी संघवाद की अहमियत है। भारत के आकार और विविधता को देखते हुए इंफ्रास्ट्रक्चर, उद्योग, शिक्षा, सार्वजनिक स्वास्थ्य और आंतरिक सुरक्षा पर केंद्र और राज्य सरकारों में तालमेल जरूरी है। लोकतंत्र में राजनीतिक मतभेद होना तय है; असल सवाल यह है कि संस्थाएं उन्हें रचनात्मक ढंग से संभाल पाती हैं या नहीं। सरकारें संवैधानिक जिम्मेदारियों और जायज क्षेत्रीय आकांक्षाओं का सम्मान करते हुए मिलकर काम करें, तो राष्ट्रीय एकता मजबूत होती है।
भारत की ताकत कुछ हद तक इसमें है कि वह कई भाषाओं, संस्कृतियों, परंपराओं और क्षेत्रीय पहचानों को साथ लेकर चलता है। राष्ट्रीय एकजुटता के लिए इन फर्कों का मिटना जरूरी नहीं है। जरूरी यह है कि नागरिक मानें कि उनकी पहचानें एक साझा संवैधानिक और राजनीतिक ढांचे में साथ रह सकती हैं।
तेज़ डिजिटल संचार के इस दौर में यह बात और अहम है, क्योंकि सार्वजनिक बहस समुदायों को जोड़ भी सकती है और अविश्वास व ध्रुवीकरण को बढ़ा भी सकती है। सामाजिक एकजुटता सिर्फ सरकारी संदेशों से नहीं बनती। इसके लिए जिम्मेदार सार्वजनिक संवाद, नागरिकों के लिए बराबर सम्मान और यह भरोसा चाहिए कि असहमति लोकतांत्रिक संस्थाओं के जरिए रखी और सुलझाई जा सकती है।
इस प्रक्रिया में युवा भारतीयों की भूमिका खास तौर पर अहम है। शैक्षिक आदान-प्रदान, सांस्कृतिक कार्यक्रम, एक राज्य से दूसरे राज्य की यात्रा और देश के अलग-अलग हिस्सों को जानने के मौके क्षेत्रीय सीमाओं के पार जान-पहचान बना सकते हैं। 2015 में घोषित एक भारत श्रेष्ठ भारत पहल का मकसद राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के बीच आपसी समझ और सांस्कृतिक आदान-प्रदान को बढ़ावा देना है। ऐसी पहलें राष्ट्रीय एकता को किसी अमूर्त आदर्श की जगह जिया हुआ अनुभव बना सकती हैं।
एकता दिवस सुरक्षा और समावेश के रिश्ते की ओर भी ध्यान खींचता है। क्षेत्रीय अखंडता की रक्षा और कानून-व्यवस्था बनाए रखना राज्य की जरूरी जिम्मेदारियां हैं, पर टिकाऊ स्थिरता इस पर भी निर्भर है कि जिन हालात में समुदाय अलग-थलग या असंतुष्ट रह जाते हैं, उन्हें दूर किया जाए। विकास, सार्वजनिक सेवाओं तक पहुंच और सार्थक भागीदारी शांति की बुनियाद को मजबूत कर सकती है।
इसलिए पटेल की विरासत को ऐतिहासिक और मौजूदा, दोनों नजरियों से समझना चाहिए। उन्होंने एकजुट भारत की राजनीतिक बुनियाद रखने में मदद की; अब की पीढ़ी को यह पक्का करना है कि लोकतांत्रिक संस्थाओं, समावेशी विकास और आपसी सम्मान के जरिए संघ एकजुट बना रहे।
राष्ट्रीय एकता की कसौटी यह नहीं कि हर नागरिक एक जैसा सोचे, बल्कि यह है कि अलग पहचान और हित वाले लोग साझा भविष्य बांट सकें। भारत जब वैश्विक स्तर पर बड़ी भूमिका और अपनी विकास महत्वाकांक्षाओं की ओर बढ़ रहा है, यह फर्क और अहम होता जा रहा है। राष्ट्रीय एकता दिवस याद दिलाता है कि एकता अतीत से मिली कोई पूरी हो चुकी उपलब्धि नहीं है। यह लगातार चलने वाली राष्ट्रीय जिम्मेदारी है, जो नागरिकता के रोजमर्रा के अनुभव से नई होती रहती है।
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