पुणे में पूर्वोत्तर के लोगों से भेदभाव और सुरक्षा का सवाल, दो छात्र संगठनों ने उठाई आवाज़
मणिपुर स्टूडेंट्स एसोसिएशन, पुणे और नॉर्थ ईस्ट कम्युनिटी ऑर्गनाइज़ेशन पुणे ने नस्लीय भेदभाव, सामाजिक बहिष्कार और सुरक्षा को लेकर साझा बयान जारी किया।
पुणे, 6 नवंबर 2026: पुणे में रहने वाले पूर्वोत्तर भारत के लोगों को कथित तौर पर नस्लीय भेदभाव, सामाजिक बहिष्कार और सुरक्षा की दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। यह बात मणिपुर स्टूडेंट्स एसोसिएशन, पुणे (MSAP) और नॉर्थ ईस्ट कम्युनिटी ऑर्गनाइज़ेशन पुणे (NECOP) ने उठाई है।
शुक्रवार को जारी एक साझा प्रेस बयान में दोनों संगठनों ने सिविल सोसायटी, शैक्षणिक संस्थानों, स्थानीय प्रशासन और आम नागरिकों से अपील की कि वे पूर्वोत्तर समुदाय के लिए सुरक्षित और सबको साथ लेकर चलने वाला माहौल बनाने की दिशा में काम करें।
संगठनों का कहना है कि भारत की सांस्कृतिक विविधता और पूर्वोत्तर की मेहमाननवाज़ी की पहचान के बावजूद वहां के लोगों को उनकी शक्ल-सूरत, रीति-रिवाज, खान-पान और रहन-सहन की वजह से पूर्वाग्रह झेलना पड़ता है। बयान में कहा गया, "जहां पूर्वोत्तर क्षेत्र को उसकी गर्मजोशी भरी मेहमाननवाज़ी के लिए दुनियाभर में सराहा जाता है, वहीं इस क्षेत्र के लोगों को अपने ही देश में बहिष्कार और पूर्वाग्रह का सामना करना पड़ता है।"
महिलाओं की सुरक्षा पर चिंता जताते हुए संगठनों ने कहा कि पूर्वोत्तर की महिलाएं छेड़छाड़ और नस्ल के आधार पर पहचान कर निशाना बनाए जाने के लिहाज़ से खास तौर पर असुरक्षित हैं। उनका आरोप है कि ऐसे अनुभवों में निजी आज़ादी पर पाबंदियां, सार्वजनिक जगहों पर लोगों की लगातार घूरती नज़रें और शारीरिक उत्पीड़न शामिल होते हैं।
बयान के मुताबिक, "पूर्वोत्तर की महिलाएं नस्लीय प्रोफाइलिंग की वजह से ज़्यादा असुरक्षा और उत्पीड़न झेलती हैं। उन पर निजी आज़ादी की कड़ी पाबंदियां लगती हैं, लगातार सार्वजनिक निगरानी रहती है और सार्वजनिक जगहों पर शारीरिक उत्पीड़न होता है।"
संगठनों ने इस क्षेत्र के पुरुषों के साथ होने वाले बर्ताव पर भी चिंता जताई। उनका आरोप है कि उन्हें गाली-गलौज, नस्लीय अपशब्द और शारीरिक उत्पीड़न झेलना पड़ता है। उनके मुताबिक भेदभाव की बार-बार होती घटनाओं से समुदाय के लोगों में अकेलेपन और असुरक्षा का एहसास पैदा हुआ है, जिसका असर उनकी रोज़मर्रा की ज़िंदगी पर पड़ता है।
बयान में आगे कहा गया, "भारत के 'विविधता में एकता' के बुनियादी सिद्धांत के बावजूद नस्लीय भेदभाव की बार-बार होती घटनाएं समुदाय के लोगों को रोज़मर्रा की ज़िंदगी में अकेला और असुरक्षित महसूस कराती हैं।"
पुणे बड़ा शैक्षणिक और पेशेवर केंद्र है, जहां पूर्वोत्तर भारत से हज़ारों छात्र और नौकरीपेशा लोग आते हैं। लेकिन MSAP और NECOP ने चिंता जताई कि शहर की मिली-जुली पहचान के बावजूद यहां का मौजूदा सामाजिक माहौल कई बार इस क्षेत्र के छात्रों और बाशिंदों को पराया और अनचाहा महसूस कराता है।
संगठनों ने कहा, "शहर की कॉस्मोपॉलिटन छवि के बावजूद यहां का मौजूदा सामाजिक माहौल अक्सर पूर्वोत्तर के छात्रों और बाशिंदों को पराया और अनचाहा महसूस कराता है।"
दोनों संगठनों ने मिलकर कदम उठाने की मांग करते हुए नागरिकों और संस्थानों से कहा कि वे नस्लीय रूढ़ियों को चुनौती दें, सामाजिक समावेश को बढ़ावा दें और यह पक्का करें कि पूर्वोत्तर के लोग पुणे में सम्मान, सुरक्षा और इज़्ज़त के साथ रह सकें, पढ़ सकें और काम कर सकें।
बयान के आखिर में कहा गया, "इस प्रेस रिलीज़ के ज़रिए हम सिविल सोसायटी, शैक्षणिक संस्थानों, स्थानीय प्रशासन और आम जनता से अपील करते हैं कि वे सच्चे मायनों में समावेश को बढ़ावा दें, नस्लीय रूढ़ियों को तोड़ें और सभी नागरिकों के लिए सुरक्षित और सम्मानजनक माहौल पक्का करें।"
यह बयान मणिपुर स्टूडेंट्स एसोसिएशन, पुणे के महासचिव बिद्यानंद हुइड्रोम की ओर से जारी किया गया।
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