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पुणे कोर्ट ने बुधवार पेठ की महिला को सुनाई एक साल की सज़ा, 2007 में नेपाली युवती को कमरे में रखा था

पुणे की अदालत ने 48 साल की माया रामबहादुर थापा को नेपाल की 19 साल की युवती को कमरे में बंद रखने के मामले में एक साल की सश्रम कैद सुनाई।

पुणे कोर्ट ने बुधवार पेठ की महिला को सुनाई एक साल की सज़ा, 2007 में नेपाली युवती को कमरे में रखा था तस्वीरें सत्यापित नहीं हैं

पुणे की एक अदालत ने बुधवार पेठ में रहने वाली 48 साल की महिला को एक साल की सश्रम कैद की सज़ा सुनाई है। उस पर आरोप था कि उसने नेपाल की एक 19 साल की युवती को बुधवार पेठ के एक कमरे में गैरकानूनी तरीके से बंद करके रखा। यह मामला 2007 का है, जब रेड-लाइट इलाके की एक बिल्डिंग पर छापा मारकर पुलिस ने युवती को छुड़ाया था।

करीब 19 साल पुराने इस केस में अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश ने फैसला दिया। बुधवार पेठ की रहने वाली माया रामबहादुर थापा को भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 344 के तहत दोषी ठहराया गया। यह धारा लंबे समय तक किसी को गलत तरीके से बंद रखने से जुड़ी है। अदालत ने एक साल की कैद के साथ 10,000 रुपये का जुर्माना भी लगाया। जुर्माना न भरने पर थापा को छह महीने की अतिरिक्त कैद भुगतनी होगी।

मामले की शुरुआत पुलिस को मिली एक सूचना से हुई थी। सूचना यह थी कि नेपाल की एक युवती को शादी का वादा करके पुणे लाया गया है और उससे जबरन देह व्यापार कराया जा रहा है। इसी टिप पर फरासखाना पुलिस ने 1 मार्च 2007 को बुधवार पेठ की अशोक बिल्डिंग की चौथी मंज़िल पर छापा मारा। वहां से इस युवती के साथ कई और महिलाओं को भी छुड़ाया गया।

लेकिन मुकदमे के दौरान अभियोजन पक्ष अपहरण और जबरन देह व्यापार के आरोप साबित नहीं कर पाया। वजह थी सबूतों की कमी। अदालत ने कहा कि पीड़िता का कोई दर्ज बयान नहीं था, जिससे पता चलता कि उसे नेपाल से कौन लाया या शादी का वादा करके किसने फुसलाया।

जांच करने वालों से एक और चूक हुई। उन्होंने उस कमरे के मालिकाना हक या किराए के कागज़ात ज़ब्त नहीं किए। इससे अदालत के सामने रखे गए सबूतों में कमियां रह गईं।

फिर भी जो सबूत मौजूद थे, उनसे यह दिखा कि युवती को उसकी मर्ज़ी के खिलाफ कमरे में रखा गया था। इसी आधार पर अदालत ने थापा को IPC की धारा 344 के तहत गलत तरीके से बंद रखने का दोषी माना और सज़ा सुनाई।

इस फैसले से साफ होता है कि मुकदमे में जो आरोप साबित नहीं हो सके, वे एक तरफ रहे। अदालत ने सिर्फ उसी जुर्म में सज़ा दी, यानी गैरकानूनी तरीके से बंद रखने में, जो सबूतों से साबित हुआ।

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