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आरटीआई आयोग ने चार महीने बाद 50 मिनट में दिया आदेश, अफसरों को चेतावनी

पुणे बेंच ने महिला व बाल विकास आयुक्तालय के अफसरों को फटकारा और अनुशासनात्मक कार्रवाई की चेतावनी दी।

आरटीआई आयोग ने चार महीने बाद 50 मिनट में दिया आदेश, अफसरों को चेतावनी तस्वीरें सत्यापित नहीं हैं

महाराष्ट्र राज्य सूचना आयोग की पुणे बेंच ने एक ऐसे मामले में सिर्फ 50 मिनट के अंदर लिखित फैसला दे दिया, जो दूसरी अपील की सुनवाई के बाद चार महीने से अटका पड़ा था। अर्जी देने वाला इस लंबे इंतजार से परेशान हो गया था और उसने देरी को लेकर बार-बार शिकायतें की थीं। इसके बाद ही फैसला आया।

आयोग ने पाया कि महिला व बाल विकास आयुक्तालय ने सूचना का अधिकार (आरटीआई) कानून, 2005 का उल्लंघन किया है। संबंधित अफसरों को फटकार लगाई गई। जन सूचना अधिकारी (पीआईओ) को चेतावनी भी दी गई कि आगे कानून के प्रावधानों का सख्ती से पालन नहीं हुआ तो अनुशासनात्मक कार्रवाई हो सकती है।

मिलिंदकुमार साल्वे आरटीआई कार्यकर्ता हैं। वे सौ एकल महिला समिति के राज्य समन्वयक और मिशन वात्सल्य की सरकारी समिति के सदस्य भी हैं। उन्होंने 31 दिसंबर 2024 को आयुक्तालय में आरटीआई अर्जी दी थी। इसमें उन्होंने क्रांतिज्योति सावित्रीबाई फुले बाल संगोपन योजना और केंद्र की मिशन वात्सल्य योजना के लाभार्थियों की जिलेवार जानकारी मांगी थी। साथ ही उन्हें दिए गए अनुदान का ब्योरा भी मांगा था।

जानकारी आयुक्तालय के पास थी, फिर भी जन सूचना अधिकारी योगेश जावडे ने सीधे जानकारी देने के बजाय साल्वे की अर्जी महाराष्ट्र के सभी 36 जिलों के जिला महिला व बाल विकास अधिकारियों को भेज दी। अर्जी 27 दिन बाद ट्रांसफर की गई, और साल्वे को इस ट्रांसफर की खबर देने में जावडे ने 56 दिन लगा दिए।

इसके बाद साल्वे ने प्रथम अपील तत्कालीन उपायुक्त और प्रथम अपील अधिकारी राहुल मोरे के सामने दायर की। मोरे ने जन सूचना अधिकारी का फैसला सही ठहराया, अर्जी वापस 36 जिला दफ्तरों को भेज दी और निर्देश दिया कि जानकारी मुफ्त दी जाए।

इस फैसले से असंतुष्ट साल्वे ने राज्य सूचना आयोग की पुणे बेंच में दूसरी अपील की। उनका कहना था कि उन्हें शक है कि आयुक्तालय जानकारी दबा रहा है। वजह यह कि विभाग ने विधानमंडल के सत्र में पूछे गए एक तारांकित सवाल के जवाब में बाल संगोपन योजना का ब्योरा और नोट्स विधानमंडल सचिवालय को दिए थे।

दूसरी अपील की सुनवाई 26 मई 2026 को सूचना आयुक्त मकरंद रानाडे ने की। सुनवाई के दौरान रानाडे ने साल्वे से लिखित शिकायत भी देने को कहा। लेकिन उसी समय सुने गए दूसरे मामलों के फैसले जारी होते रहे और साल्वे के मामले का आदेश अटका रहा। चार महीने इंतजार के बाद उन्होंने आयोग में दो शिकायतें दीं, पर कोई जवाब नहीं मिला।

आखिर में साल्वे ने तीसरी शिकायत ईमेल से भेजी और पुणे के विभागीय सूचना आयुक्त से उनके निजी संपर्क नंबर पर भी बात की। इन शिकायतों पर तुरंत कार्रवाई हुई और 26 मई की सुनवाई का लिखित फैसला साल्वे को 50 मिनट में मिल गया। आदेश की कॉपी हाल ही में उन्हें दी गई।

अपने आदेश में सूचना आयुक्त मकरंद रानाडे ने कहा कि जन सूचना अधिकारी योगेश जावडे प्रथम अपील अधिकारी का आदेश लागू करने में नाकाम रहे, जो आरटीआई कानून, 2005 के प्रावधानों का उल्लंघन है। आयोग ने जावडे को गंभीर लापरवाही के लिए फटकारा। साथ ही चेतावनी दी कि आगे अर्जियों को निपटाते समय कानून का सख्ती से पालन नहीं हुआ तो कानून के तहत अनुशासनात्मक कार्यवाही का प्रस्ताव रखा जाएगा।

आयोग ने यह भी निर्देश दिया कि आयुक्तालय के उपायुक्त (महिला व बाल विकास) को इस मामले में सूचना अधिकारी नियुक्त किया जाए। वे अपीलकर्ता मिलिंदकुमार साल्वे को मांगी गई जानकारी 15 दिन के अंदर मुफ्त दें।

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