पुणे के शामिल गांवों में ड्रेनेज और STP के बड़े टेंडर तोड़ने की मांग, निलेश निकम ने की अपील
पीएमसी में विपक्ष के नेता निलेश निकम ने शामिल गांवों के ड्रेनेज और STP के काम छोटे पैकेजों में बांटने की मांग की है।
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पुणे: पुणे महानगरपालिका (PMC) में विपक्ष के नेता एडवोकेट निलेश निकम ने मांग की है कि शहर की सीमा में शामिल किए गए गांवों में ड्रेनेज नेटवर्क और सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (STP) के काम सैकड़ों करोड़ रुपये के बड़े ठेकों में न बांधे जाएं। उनका कहना है कि गांव के हिसाब से या प्राकृतिक बेसिन के हिसाब से छोटे टेंडर निकाले जाएं।
निकम ने इस बारे में नगर आयुक्त को एक ज्ञापन दिया है। उसमें उन्होंने टेंडर प्रक्रिया में ज्यादा प्रतिस्पर्धा और पारदर्शिता की मांग की है। साथ ही काम की क्वालिटी, लोगों की सुरक्षा और प्रशासन की जवाबदेही के इंतजाम भी मांगे हैं।
इन गांवों में ड्रेनेज नेटवर्क और STP प्रोजेक्ट के बड़े टेंडर जल्द निकलने की उम्मीद है। लेकिन इन इलाकों के विकास प्लान अभी तक अटके हुए हैं। निकम का कहना है कि महानगरपालिका को पहले प्राकृतिक नालों, ड्रेन, मौजूदा सड़कों और गंदे पानी के बहाव का सर्वे कराना चाहिए। यह सर्वे प्राकृतिक ड्रेनेज बेसिन के आधार पर हो, और उसके बाद ही काम की योजना बने। उन्होंने कहा है कि एक बड़े टेंडर की जगह तकनीकी जरूरत के हिसाब से अलग-अलग पैकेज बनाए जाएं, इससे महानगरपालिका का ही फायदा होगा।
निकम ने करीब 300 करोड़ से 350 करोड़ रुपये के टेंडर में प्रोजेक्ट जोड़ने के प्रस्ताव पर ऐतराज जताया है। उनके मुताबिक ऐसे ठेकों से काबिल स्थानीय ठेकेदारों के लिए बोली में हिस्सा लेने का मौका कम हो सकता है। उन्होंने आरोप लगाया कि बड़े प्रोजेक्ट लेने वाले ठेकेदार अपना मुनाफा रख लेते हैं और असल काम कम रेट पर सबकॉन्ट्रैक्ट में दे देते हैं। उनका कहना है कि इससे निर्माण की क्वालिटी बिगड़ सकती है।
उन्होंने PMC से यह भी कहा है कि सेंट्रल विजिलेंस कमीशन की गाइडलाइन देखी जाएं, ताकि जरूरत से ज्यादा सख्त पात्रता शर्तें प्रतिस्पर्धा को खत्म न करें। उनका कहना है कि छोटे पैकेज होने पर कई जगह एक साथ काम शुरू हो सकता है। ज्ञापन के मुताबिक इससे प्रोजेक्ट नौ से 12 महीने में पूरे हो सकते हैं, जबकि अभी वे तीन-चार साल तक खिंच सकते हैं। निकम के हिसाब से कम समय लगने पर कीमत बढ़ने से होने वाला अतिरिक्त खर्च घटेगा और खुदाई के बाद सड़कें जल्दी ठीक हो सकेंगी।
निकम ने लंबे समय तक सड़कें खुदी रहने के खतरे भी गिनाए हैं, जैसे ट्रैफिक जाम और हादसे। उनके ज्ञापन में एक बुजुर्ग की मौत का जिक्र है, जो कथित तौर पर 18 अक्टूबर 2026 को ड्रेनेज के काम के लिए खोदे गए गड्ढे में गिर गए थे। इसी को देखते हुए उन्होंने ऐसा समयबद्ध निर्माण शेड्यूल मांगा है, जिसमें लोगों की सुरक्षा पहले आए।
उन्होंने यह भी प्रस्ताव दिया है कि ट्रैफिक पुलिस, रेलवे, नेशनल हाईवेज अथॉरिटी ऑफ इंडिया और बिजली विभाग से जरूरी मंजूरी लेने की जिम्मेदारी ठेकेदारों की हो। उनका कहना है कि इन मंजूरियों में देरी के आधार पर न एक्सटेंशन दिया जाए और न अतिरिक्त भुगतान। ज्ञापन में यह भी सुझाव है कि प्रोजेक्ट पर लगे इंजीनियरों का काम पूरा होने तक तबादला न किया जाए, क्योंकि असरदार निगरानी के लिए देखरेख में निरंतरता जरूरी है।
निकम ने मांग की है कि हर ड्रेनेज लाइन की पूरी जानकारी, यानी लंबाई, गहराई और मैनहोल की जगह, जियोटैग करके GIS के जरिए सबके लिए उपलब्ध कराई जाए। उन्होंने यह भी कहा है कि बिल चुकाने से पहले विजिलेंस विभाग कम से कम 25 प्रतिशत पूरे हो चुके काम की क्वालिटी और नाप की जांच करे। ज्ञापन में देरी पर जुर्माने की मांग है और क्वालिटी में कमी मिलने पर प्रोजेक्ट कंसल्टेंट की फीस रोकने का प्रस्ताव है।
महाराष्ट्र म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन्स एक्ट की धारा 73 और 74 और सूचना का अधिकार कानून की धारा 4 का हवाला देते हुए निकम ने प्रशासन से कहा है कि सार्वजनिक पैसे का सही इस्तेमाल पक्का करने के लिए ये शर्तें टेंडर दस्तावेजों में डाली जाएं। उन्होंने चेतावनी दी है कि अगर ये मांगें नहीं मानी गईं, तो वे कथित तौर पर जनता के पैसे की बर्बादी रोकने के लिए बॉम्बे हाई कोर्ट में जनहित याचिका (PIL) दायर करेंगे।
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