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कोरेगांव पार्क में पेड़ों की उम्र कागज पर घटाने का आरोप, ट्रांसप्लांट किए 109 में से 45 पेड़ सूखे

कोरेगांव पार्क में सड़क चौड़ीकरण के दौरान पेड़ों को दूसरी जगह लगाने के नाम पर पीएमसी पर गंभीर आरोप लगे हैं। पर्यावरण कार्यकर्ताओं का कहना है कि पुराने पेड़ों की उम्र कागज पर कम दिखाई गई।

कोरेगांव पार्क में पेड़ों की उम्र कागज पर घटाने का आरोप, ट्रांसप्लांट किए 109 में से 45 पेड़ सूखे तस्वीरें सत्यापित नहीं हैं

पुणे: घने हरे पेड़ों, छायादार सड़कों और ठंडे मौसम के लिए मशहूर कोरेगांव पार्क अपनी पहचान तेजी से खोता जा रहा है। कभी पुणे का हरा फेफड़ा कहा जाने वाला यह इलाका अब पुराने पेड़ों का कब्रिस्तान बनता दिख रहा है। आरोप है कि इसकी वजह पुणे नगर निगम (पीएमसी) की बिगड़ी हुई "ट्री ट्रांसप्लांटेशन" मुहिम है, जो इंफ्रास्ट्रक्चर के काम के लिए चलाई गई।

जमीनी रिपोर्टों और स्थानीय पर्यावरण कार्यकर्ताओं के मुताबिक कोरेगांव पार्क एनेक्स में करीब 18 महीने पहले एक बड़े सड़क चौड़ीकरण प्रोजेक्ट के दौरान पीएमसी ने 109 पेड़ों को सुरक्षित दूसरी जगह लगाने का दावा किया था। इनमें से कम से कम 45 पेड़ पूरी तरह सूखकर मर चुके हैं।

इससे भी चौंकाने वाली बात यह बताई जा रही है कि दशकों पुराने कई पेड़ कभी नई जगह ले जाए ही नहीं गए। उनकी जड़ें काट दी गईं और ठूंठ वहीं खड़े छोड़ दिए गए, ताकि वे अपने आप मर जाएं।

महाराष्ट्र में ट्री एक्ट के तहत 50 साल या उससे ज्यादा उम्र के पेड़ों को "हेरिटेज ट्री" के तौर पर खास सुरक्षा मिलती है। ऐसे पेड़ को काटने या हटाने के लिए सख्त मंजूरी लगती है, ज्यादा जुर्माना भरना पड़ता है और उसकी भरपाई के लिए नए पेड़ लगाना जरूरी होता है।

पर्यावरण कार्यकर्ताओं का आरोप है कि इन सख्त नियमों से बचने के लिए नगर निगम के अफसर पेड़ों की आधिकारिक गिनती और प्रोजेक्ट की फाइलों में हेराफेरी करते रहते हैं।

कोरेगांव पार्क में इस हेराफेरी का सबसे बड़ा सबूत दो विशाल और जाने-पहचाने रबर के पेड़ बताए जा रहे हैं। पीएमसी की आधिकारिक फाइल में इन्हें सिर्फ 20 से 22 साल पुराना दर्ज किया गया। लेकिन इलाके के पुराने निवासी और पेड़-पौधों के जानकार कहते हैं कि ये पेड़ आधी सदी से भी ज्यादा समय से वहां खड़े थे।

एक पर्यावरण शोधकर्ता ने कहा, "कागज पर पेड़ की उम्र 50 साल से घटाकर 20 साल कर देने से पीएमसी ने उनका हेरिटेज दर्जा असल में छीन लिया। इससे पेड़ काटने के आदेश बिना ज्यादा जांच और बिना जवाबदेही के जल्दी निकल गए।"

मामला अप्रैल 2025 का है, जब नगर निगम ने कोरेगांव पार्क में एक मशहूर फार्म और एक फाइव स्टार होटल के बीच के हिस्से में सड़क चौड़ीकरण शुरू किया। शुरुआत में कुल 193 पेड़ प्रोजेक्ट में रुकावट माने गए। आधिकारिक समीक्षा के बाद पीएमसी की ट्री अथॉरिटी ने 108 पेड़ पूरी तरह काटने और 85 पेड़ वैज्ञानिक तरीके से दूसरी जगह लगाने की इजाजत दी।

स्थानीय लोगों और पर्यावरण कार्यकर्ताओं का कहना है कि यह नगर प्रशासन की ओर से सोची-समझी लीपापोती है, ताकि काटे गए पेड़ों की उम्र और पर्यावरणीय कीमत कम दिखाई जा सके। मरे हुए पेड़ों में वही दो विशाल रबर के पेड़ शामिल हैं। इलाके के पुराने लोग कहते हैं कि ये पेड़ 50 साल से कम के नहीं थे और प्रोजेक्ट शुरू होने से पहले इनकी पूरी घनी छतरी बनी हुई थी। कार्यकर्ताओं के मुताबिक उम्र और आकार कम दिखाने से लोगों की नाराजगी कम हुई और भरपाई के उपाय भी घट गए।

साधु वासवानी चौक के रहने वाले बाजीराव शिंदे ने पीएमसी की भारी लापरवाही पर गुस्सा जताया। उन्होंने कहा, "ट्रांसप्लांटेशन के नाम पर बड़ी-बड़ी डालियां और घनी छतरियां काट दी गईं और पूरे बड़े पेड़ सिर्फ ठूंठ बनाकर छोड़ दिए गए। इन पेड़ों में जिंदगी के कोई निशान नहीं दिखते। एक मशहूर शॉपिंग मॉल, ऊंची इमारतों और एक बड़ी फाइनेंस कंपनी के दफ्तरों के पास कई पेड़ों के रूट-बॉल तैयार किए गए, लेकिन उन्हें नई जगह ले जाया ही नहीं गया। उन्हें वहीं मिट्टी में खड़ा छोड़ दिया गया, सूखकर मरने के लिए।"

शिंदे ने उन जगहों का जिक्र भी किया जहां यह मुहिम बिगड़ी। उन्होंने कहा, "एक बड़ी कमर्शियल बिल्डिंग के पास सिर्फ पांच-छह पेड़ कुछ मीटर दूर शिफ्ट किए गए और आज उनमें से मुश्किल से एक-दो में जान के निशान हैं।"

पेड़ काटने को लेकर नाराजगी अब सिर्फ कोरेगांव पार्क तक सीमित नहीं है। कोथरूड, भोसलेनगर और सोमवार पेठ के नागरिक भी अलग-अलग सड़क और इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट के लिए चल रही पेड़ कटाई के खिलाफ खुलकर बोल रहे हैं। नागरिकों का आरोप है कि मंजूरी लेने के लिए पीएमसी ट्रांसप्लांटेशन के झूठे वादे करती है और पेड़ उखाड़ने के बाद न कोई फॉलो-अप होता है, न देखभाल।

स्थानीय निवासी मनोज राव ने कहा कि उखाड़े गए पेड़ बचे या नहीं, यह देखने का नगर निगम के पास कोई सिस्टम ही नहीं है। उनके मुताबिक, "ट्रांसप्लांटेशन अब पेड़ काटने का आसान कानूनी बहाना बन गया है, जिसमें पेड़ों के जिंदा रहने की कोई जिम्मेदारी नहीं ली जाती।"

पीएमसी के एक वरिष्ठ अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर नगर निगम की कार्रवाई का बचाव किया। उनका दावा है कि जरूरत से ज्यादा पेड़ बचाने की कोशिश की गई। अधिकारी ने कहा, "हमने मंजूरी से भी ज्यादा ध्यान रखा। मंजूर किए गए सभी 108 पेड़ काटने के बजाय हमने सिर्फ 38 काटे और 109 पेड़ ट्रांसप्लांट करने की कोशिश की, जिनमें कुछ ऐसे भी थे जिन्हें पूरी तरह काटना तय था। लेकिन ट्रांसप्लांट किए गए 109 में से कम से कम 45 मर गए हैं।"

करीब आधे पेड़ क्यों मर गए, यह पूछने पर अधिकारी ने कुदरती वजहों को जिम्मेदार ठहराया। उन्होंने कहा, "वैज्ञानिक तरीके से भी पेड़ ट्रांसप्लांट करने की कामयाबी कभी 100 फीसदी नहीं होती। पानी नियमित दिया गया, लेकिन जड़ों की बनावट के फर्क और पर्यावरणीय वजहों से कुछ पेड़ नई जगह में ढल नहीं पाए और बढ़ नहीं पाए।"

पुणे का हरा आवरण तेजी से घट रहा है। ऐसे में नागरिक और पर्यावरण संगठन अब पिछले तीन साल में पीएमसी के किए सभी ट्री ट्रांसप्लांटेशन प्रोजेक्ट का स्वतंत्र ऑडिट कराने की मांग करने की तैयारी में हैं।

कोथरूड के रहने वाले राम सिन्हा ने कहा, "पीएमसी बेहद खराब हालात में और सही जानकारी के बिना ट्रांसप्लांटेशन करती है, जिससे आखिर में इन पेड़ों की मौत हो जाती है।" स्थानीय निवासी मनोज जायसवाल ने कहा, "शहर में विकास के काम करते समय नगर निगम को मौजूदा हरे आवरण को बचाने और हमारे पर्यावरण की हिफाजत को पहली प्राथमिकता देनी चाहिए।"

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