शनिवार, 7 नवंबर 2026

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पुणे: बीमा होने पर भी अस्पताल से छुट्टी में छह घंटे लगे, बिल पर अस्पताल और TPA में खींचतान

पुणे: बीमा होने पर भी अस्पताल से छुट्टी में छह घंटे लगे, बिल पर अस्पताल और TPA में खींचतान तस्वीरें सत्यापित नहीं हैं
सेहत PT24 टीम

हडपसर के सह्याद्री हॉस्पिटल्स मॉमस्टोरी में भर्ती बच्ची के परिवार का कहना है कि मेडिक्लेम होने के बावजूद बिल के फर्क में उन्हें रात 11 बजे तक रुकना पड़ा।

पुणे के एक परिवार का कहना है कि मेडिक्लेम पॉलिसी होने के बावजूद उसे अस्पताल से छुट्टी मिलने में छह घंटे लग गए। परिवार के मुताबिक अस्पताल और थर्ड-पार्टी एडमिनिस्ट्रेटर (TPA) के बीच बिल को लेकर मतभेद था, और उसका बोझ मरीज के परिवार पर आ पड़ा। यह पूरा वाकया परिवार की एक सदस्य ने खुद बयान किया है।

उनके मुताबिक डेंगू के शक में उनकी बेटी को हडपसर के सह्याद्री हॉस्पिटल्स मॉमस्टोरी में भर्ती कराया गया था। चार दिन के इलाज का अनुमान करीब Rs 75,000 बताया गया था। परिवार का कहना है कि इतनी रकम के बदले कम से कम बुनियादी देखभाल की उम्मीद थी, लेकिन उनकी मंजिल पर सिर्फ एक नर्स और एक सहायक कर्मचारी (मौसी) थीं और मदद के लिए बुलाने पर कभी-कभी देर से जवाब मिलता था। वार्ड कोऑर्डिनेटर से शिकायत की तो उन्हें बताया गया कि अस्पताल में मरीजों की भीड़ बहुत है।

उन्होंने यह भी बताया कि बच्ची के नाक के एक्स-रे के लिए उसे पास की मुख्य इमारत में ले जाना पड़ा। उनके अनुसार जिस एंबुलेंस वैन से ले जाया गया उसमें बदबू थी। मुख्य इमारत के दरवाजे पर एक शोकग्रस्त परिवार मौजूद था, और व्हीलचेयर पर बैठी बच्ची माहौल देखकर डर गई। अंदर दवाइयों की तेज गंध से दोनों को मितली आई। एक्स-रे के बाद भी इंतजार करना पड़ा, पहले दरवाजे के खाली होने का और फिर एंबुलेंस का। लौटते वक्त बड़ी गाड़ी आई, पर उसमें भी वैसी ही हालत थी। कमरे में पहुंचकर उल्टी होने के बाद ही उन्हें ठीक लगा।

असली परेशानी छुट्टी के दिन शुरू हुई। परिवार के मुताबिक विजिटिंग डॉक्टर शाम 4 बजे के थोड़ी देर बाद आए, सारे पैरामीटर देखे और छुट्टी की इजाजत दे दी। नर्स ने बच्ची को दी जाने वाली दवाइयां समझाईं। इसके बाद कागजात वार्ड से बिलिंग विभाग, फिर अस्पताल के इंश्योरेंस सेक्शन और आखिर में TPA तक पहुंचे।

परिवार के बीमा सलाहकार जिमी सुर्टी ने बताया था कि सिर्फ Rs 16,141 भरने होंगे। मगर बिलिंग विभाग ने Rs 23,852 मांगे। सवाल करने पर परिवार को बताया गया कि TPA ने कुछ रकम काट ली है और अस्पताल इतना बोझ नहीं उठा सकता। परिवार का कहना है कि यह अस्पताल और बीमा कंपनी का मामला है, मरीज का परिवार इसकी कीमत क्यों चुकाए। उन्हें कमरे में रुकने को कहा गया, जबकि सलाहकार फोन पर लगातार पूछताछ करते रहे।

दो घंटे तक कोई खबर नहीं आई तो वे नीचे गईं और बिलिंग व इंश्योरेंस सेक्शन में ताला लगा पाया। उन्हें रिसेप्शन भेजा गया, जहां कहा गया कि मामला सुलझाया जा रहा है। रिसेप्शनिस्ट उनकी तरफ से फोन करती रही, पर कोई समय-सीमा नहीं बताई गई। रात 10 बजे तक उनके पति भी अस्पताल पहुंच गए। आखिर रात 10.15 बजे बिल निपटा, जिसमें सलाहकार, TPA के कपलेश मायंगडे और बिलिंग व इंश्योरेंस स्टाफ से तालमेल बिठाने वाली रिसेप्शनिस्ट की मदद रही।

परिवार के मुताबिक वहां एक और परिवार भी इसी हाल में था। एक रिक्शा चालक ने कहा कि वह फर्क की रकम नहीं भर सकता। रिसेप्शनिस्ट के मुताबिक TPA ने एक तय रकम मंजूर की थी और बाकी मरीज के पिता को देना था। TPA का कहना था कि अस्पताल ने कई ऐसे चार्ज लगाए हैं जो पॉलिसी में कवर नहीं हैं।

रात 11 बजे अस्पताल से निकलते वक्त परिवार के मन में कई सवाल थे। लेखिका का पूछना है कि बीमा होने पर भी वे चार्ज मरीज से क्यों वसूले जाते हैं जिन्हें TPA नहीं देता, और बायोमेडिकल वेस्ट का चार्ज मरीजों पर क्यों डाला जा सकता है। उनके मुताबिक इस कचरे का निपटान अस्पताल की कानूनी जिम्मेदारी है। उन्होंने मांग की है कि महानगरपालिका और राज्य सरकार दखल दें, अस्पताल आइटमवार रेट लिस्ट छापें, छुट्टी और क्लेम निपटारे की साफ समय-सीमा हो, रात में भी जवाबदेह स्टाफ रहे और शिकायत के लिए अलग व्यवस्था बने।

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