कूल्हा प्रत्यारोपण अब सिर्फ बुजुर्गों के लिए नहीं, कम उम्र के मरीजों में भी बढ़ रहे मामले
पुणे के सैश्री वाइटलाइफ हॉस्पिटल्स के डॉ. नीरज अडकर ने कम उम्र के मरीजों के लिए हिप रिप्लेसमेंट की तकनीकों के बारे में बताया।
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वाकड, 22 अक्टूबर 2026: हिप रिप्लेसमेंट यानी कूल्हे का जोड़ बदलने की सर्जरी अब सिर्फ बुजुर्गों तक सीमित नहीं रही। एवैस्कुलर नेक्रोसिस (AVN) जैसी बीमारी में कूल्हे की हड्डी तक खून की सप्लाई प्रभावित होती है, और इससे कम उम्र और मध्यम उम्र के मरीजों के जोड़ को भी गंभीर नुकसान पहुंच सकता है।
पुणे के सैश्री वाइटलाइफ हॉस्पिटल्स में चीफ रोबोटिक जॉइंट रिप्लेसमेंट सर्जन और स्पोर्ट्स इंजरी स्पेशलिस्ट डॉ. नीरज अडकर ने बताया कि कूल्हे के दर्द के इलाज और मरीजों को फिर से चलने-फिरने लायक बनाने के लिए सर्जरी की तकनीकों में क्या तरक्की हुई है। टेक्नोलॉजी की मदद से सर्जरी की प्लानिंग भी अब इसी मकसद से की जा रही है।
कूल्हे का दर्द अक्सर धीरे-धीरे बढ़ता है। सीढ़ियां चढ़ना, चलना और सफर करना जैसे रोज के काम मुश्किल होने लगते हैं। जैसे-जैसे हालत बिगड़ती है, मरीज को आम कामकाज करना और भारी पड़ता जाता है। जहां कूल्हे का जोड़ बुरी तरह खराब हो चुका हो, वहां सही मेडिकल जांच के बाद हिप रिप्लेसमेंट पर विचार किया जा सकता है।
डायरेक्ट एंटीरियर अप्रोच (DAA) क्या है? यह एक सर्जिकल तरीका है, जिसमें सर्जन कूल्हे के सामने वाले हिस्से में चीरा लगाकर जोड़ तक पहुंचता है। इसमें मांसपेशियों को काटा नहीं जाता, सर्जन उनके बीच से रास्ता बनाता है। इसका एक रूप बिकिनी इंसिजन कहलाता है, जिसमें चीरा त्वचा की कुदरती सिलवट के साथ लगाया जाता है।
चुने हुए मरीजों को इस तरीके से शुरुआती रिकवरी में कुछ फायदे मिल सकते हैं। सर्जरी के बाद के पहले कुछ महीनों में दर्द कम हो सकता है और कूल्हा बेहतर चल सकता है। लेकिन ये फायदे हर मरीज में अलग-अलग होते हैं। अभी तक के सबूतों से यह साबित नहीं होता कि DAA से लंबे वक्त में नतीजे दूसरे जमे हुए तरीकों से हमेशा बेहतर रहते हैं। यह तकनीक किसके लिए ठीक है, यह मरीज के शरीर की बनावट, उसकी बीमारी और सर्जन के आकलन पर निर्भर करता है।
अब बात हिप नेविगेशन टेक्नोलॉजी की। सैश्री वाइटलाइफ हॉस्पिटल्स हिप रिप्लेसमेंट में मदद के लिए VELYS(TM) Hip Navigation System का इस्तेमाल करता है। अस्पताल का कहना है कि वह भारत में यह टेक्नोलॉजी लाने वाला पहला सेंटर है।
अस्पताल के मुताबिक सर्जरी से पहले डिजिटल टेम्पलेटिंग से प्लानिंग में मदद मिलती है, जिसमें पैर की लंबाई का आकलन भी शामिल है। सर्जरी के दौरान नेविगेशन टेक्नोलॉजी रियल-टाइम गाइडेंस देती है, ताकि सर्जन इम्प्लांट की पोजीशन, कप के एंगल, हिप ऑफसेट और पैर की लंबाई को परख सके। ऐसे सिस्टम सर्जरी की प्लानिंग और फैसले में मदद के लिए हैं। वे सर्जन के क्लिनिकल जजमेंट, उसके तजुर्बे या ऑपरेशन की जिम्मेदारी की जगह नहीं लेते।
अस्पताल DAA से हिप रिप्लेसमेंट कराने वाले चुने हुए मरीजों के लिए बिना टांके वाली क्लोजर तकनीकें भी देता है। मरीज की हालत और सर्जन के आकलन के हिसाब से इनसे आम बाहरी टांकों और बाद में टांके निकलवाने की जरूरत खत्म हो सकती है। मकसद घाव की देखभाल के कुछ पहलू आसान करना है, हालांकि घाव भरने का वक्त और निशान कैसा दिखेगा, यह हर मरीज में अलग हो सकता है।
डॉ. अडकर ने कहा कि AVN जैसी बीमारियों वाले कम उम्र के मरीज बढ़ने से हिप रिप्लेसमेंट को देखने का नजरिया बदला है। उन्होंने कहा, "आज हम AVN जैसी बीमारियों के मरीज बहुत कम उम्र में देख रहे हैं, और उनके लिए हिप रिप्लेसमेंट सिर्फ दर्द से राहत की बात नहीं है, यह अपनी जिंदगी वापस पाने की बात है। आखिर में टेक्नोलॉजी तभी कीमती है जब वह हमें मरीजों को बेहतर देखभाल और ज्यादा भरोसा देने में मदद करे।"
जोड़ को भारी नुकसान झेल रहे योग्य मरीजों में हिप रिप्लेसमेंट से दर्द घट सकता है और चलना-फिरना बेहतर हो सकता है। इससे वे चलने और सफर करने जैसे कामों में ज्यादा आराम से लौट सकते हैं।
जो मरीज सर्जरी के बारे में सोच रहे हैं, उनके लिए अनुभवी ऑर्थोपेडिक सर्जन से जांच कराना काम आ सकता है। इससे तय हो सकता है कि हिप रिप्लेसमेंट ठीक रहेगा या नहीं और कौन सा सर्जिकल तरीका उनकी हालत के हिसाब से सबसे अच्छा है। क्लिनिकल जरूरत के हिसाब से नेविगेशन टेक्नोलॉजी और नए चीरे और क्लोजर के तरीके भी इस चर्चा का हिस्सा हो सकते हैं।
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