आईआईएसईआर पुणे की लाइब्रेरी से उमर खालिद की किताब हटी, सोशल मीडिया पर उठा था सवाल
संस्थान ने इसे एहतियात के तौर पर उठाया गया कदम बताया है।
तस्वीरें सत्यापित नहीं हैं
भारतीय विज्ञान शिक्षा एवं अनुसंधान संस्थान यानी आईआईएसईआर पुणे ने अपनी लाइब्रेरी से उमर खालिद की लिखी एक किताब हटा दी है। खालिद जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी (जेएनयू) के पूर्व स्टूडेंट लीडर हैं। संस्थान का कहना है कि किसी तरह की गलतफहमी या अशांति न फैले, इसी वजह से यह कदम उठाया गया।
मामला सोशल मीडिया की एक पोस्ट से शुरू हुआ। उस पोस्ट में सवाल उठाया गया था कि यह किताब संस्थान के कलेक्शन में क्यों है। बताया गया है कि पोस्ट के साथ एक डिजिटल डिस्प्ले की तस्वीर लगी थी, जिस पर लाइब्रेरी की किताबों के नाम दिख रहे थे। उन्हीं में Fractured Communities: Adivasi Histories and the Politics of Power भी मौजूद थी।
आईआईएसईआर पुणे ने एक बयान जारी कर कहा कि यह किताब एहतियात के तौर पर हटाई गई है। संस्थान के मुताबिक जब यह बात अधिकारियों की नजर में आई, तब यह फैसला लिया गया। प्रशासन ने साफ किया कि मकसद किसी भी तरह की उलझन या गड़बड़ी से बचना था।
यह किताब खालिद की जेएनयू में की गई डॉक्टरेट रिसर्च पर आधारित है। इसमें आदिवासी इतिहास और सत्ता की राजनीति पर बात की गई है। खालिद पर 2020 के दिल्ली दंगों से जुड़े कथित बड़े साजिश मामले में आरोप हैं।
लाइब्रेरी कैसे चलती है, इस पर भी संस्थान ने सफाई दी। उसका कहना है कि कलेक्शन मेंबर्स की सिफारिशों के आधार पर बनता है और इसकी देखरेख के लिए एक अलग कमेटी है। आम तौर पर हर महीने अलग अलग विषयों की 50 से ज्यादा किताबें लाइब्रेरी में जोड़ी जाती हैं।
प्रशासन ने यह भी कहा कि खालिद की किताब को लेकर फैसला तब हुआ, जब अधिकारियों को पता चला कि वह लाइब्रेरी में शामिल है और उस पर चिंताएं जताई गई हैं।
इस कदम के बाद एक बड़ा सवाल सामने आया है कि शैक्षणिक संस्थान अपनी लाइब्रेरी के लिए किताबें किस प्रक्रिया से चुनते हैं और उन्हें रखने या हटाने का फैसला कैसे करते हैं। यह सवाल खास तौर पर तब उठता है, जब कोई किताब सार्वजनिक बहस का मुद्दा बन जाए।
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