उमरेड-करहांडला से पेंच पहुंची बाघिन, करीब 150 किमी का सफर तय किया
तस्वीरें सत्यापित नहीं हैं
साढ़े तीन साल की बाघिन उमरेड-पौनी-करहांडला अभयारण्य से निकलकर नागपुर जिले के पेंच टाइगर रिज़र्व तक पहुंची है।
पूर्वी महाराष्ट्र के जंगलों में एक साढ़े तीन साल की बाघिन ने लंबा सफर तय किया है। अनुमान है कि वह 140 से 150 किमी चलकर नागपुर और भंडारा जिलों में फैले उमरेड-पौनी-करहांडला वाइल्डलाइफ सैंक्चुअरी (UPKW) से नागपुर जिले के पेंच टाइगर रिज़र्व पहुंची है।
पेंच टाइगर रिज़र्व के डिप्टी डायरेक्टर अक्षय गजभिये ने बताया कि UPKW के गोठणगांव की बाघिन F2 के आखिरी लिटर का यह शावक 29 अक्टूबर को पेंच के चोरबाहुली गेट के पास दिखा। यह सब-एडल्ट बाघिन है और उसके इस सफर पर वन अधिकारियों की नज़र गई है।
अधिकारी इसे बाघों के अपने आप नई जगह की तलाश में निकलने का अच्छा संकेत मान रहे हैं। उनका कहना है कि इससे उम्मीद बनती है कि इलाके के जंगल अब भी इतने जुड़े हुए हैं कि बाघ नए इलाके की खोज में एक जगह से दूसरी जगह जा सकें।
उमरेड-करहांडला नागपुर से करीब 60 किमी दूर है। पेंच टाइगर रिज़र्व पूर्वी विदर्भ के उत्तरी हिस्से में है और नागपुर जिले के रामटेक, पारसेनी और सावनेर तालुकों में फैला है। यह महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश की सीमा के पास पड़ता है। वन विभाग के अधिकारियों ने कहा कि अभी यह कहना जल्दबाज़ी होगी कि बाघिन पेंच में बस गई है या सिर्फ वहां से गुज़र रही है।
गजभिये के मुताबिक बाघिन शायद अपने लिए ठीक इलाके की तलाश में घूम रही है। कुही, भंडारा, रामटेक, पौनी, पौनी बफर और NH-44 से होते हुए चोरबाहुली तक उसके संभावित रास्ते पर फिलहाल सोचा जा रहा है। हालांकि यह गलियारा कितना काम का और लगातार जुड़ा हुआ है, इसके लिए और निगरानी और वैज्ञानिक जांच की ज़रूरत होगी।
गजभिये ने कहा, "यह नज़ारा अच्छा संकेत है कि जवान बाघ जंगलों से होकर नए इलाकों में जा रहे हैं। हम अभी निगरानी कर रहे हैं और यह कहना बहुत जल्दी है कि बाघिन वहीं रहती है। हमारी पहली कोशिश यह है कि जंगल सुरक्षित और ठीक रहे, ताकि यह बाघिन अपना इलाका पा सके और पेंच में बाघों की आबादी वक्त के साथ स्थिर हो।"
अधिकारियों के मुताबिक संरक्षित जंगल की सीमा के बाहर भी सही रहने की जगह बचाए रखना ज़रूरी है, ताकि वन्यजीव आ-जा सकें। उन्होंने बताया कि चोरबाहुली वाइल्डलाइफ रेंज में नियमित गश्त, रहने की जगह में सुधार, पानी का संरक्षण, वन बांध और समुदाय की भागीदारी जैसे लगातार उपायों से वन्यजीवों के लिए माहौल बेहतर हुआ है। उनके मुताबिक बाघों के लंबे समय तक बचे रहने के लिए जंगल और उनके बीच का जुड़ाव बचाना ज़रूरी है।
कॉर्बेट फाउंडेशन के वाइल्डलाइफ कंज़र्वेशनिस्ट केदार गोरे ने कहा, "मध्य भारत का विदर्भ इलाका बाघ संरक्षण के लंबे भविष्य के लिए बड़ी उम्मीद रखता है। बिखरे हुए जंगलों में बाघों का इधर-उधर जाना अच्छी बात है, और इससे उन पारिस्थितिक गलियारों की अहमियत दिखती है जो इन ठिकानों को जोड़ते हैं। लेकिन यहां बाघ संरक्षण का भविष्य काफी हद तक इस पर टिका है कि महाराष्ट्र सरकार विकास की प्राथमिकताओं और पर्यावरण की सुरक्षा के बीच संतुलन कैसे बनाती है। इलाके में कई खनन परियोजनाएं प्रस्तावित हैं, इसलिए योजना और फैसलों में बाघों के ठिकानों, अहम गलियारों और जंगलों के जुड़ाव को प्राथमिकता मिलना ज़रूरी है।"
संभावित रास्ता उमरेड-करहांडला, कुही, भंडारा, पौनी और फिर पेंच (चोरबाहुली गेट) बताया जा रहा है।
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