पोलार्ड मुंबई इंडियंस के नए हेड कोच, 40 पार महिलाओं के लिए कोचिंग प्रोग्राम भी
तस्वीरें सत्यापित नहीं हैं
मुंबई की रविवार डायरी में क्रिकेट, महिला सम्मेलन, फोक गीतों पर डॉक्यूमेंट्री और एक मेमॉयर की बातें।
दादर बीच पर कुछ नौजवान इन दिनों स्टंट और कलाबाजियों की प्रैक्टिस करते दिख रहे हैं।
मुंबई इंडियंस ने इसी हफ्ते बड़ा ऐलान किया। श्रीलंका के दिग्गज बल्लेबाज महेला जयवर्धने की जगह अब किरोन पोलार्ड हेड कोच होंगे। पिछले छह सीजन में फ्रेंचायजी का IPL प्रदर्शन चमकदार नहीं रहा और जब अलमारी में ट्रॉफियां नहीं आतीं, तो बदलाव तय हो जाता है। लंबे-चौड़े पोलार्ड जयवर्धने के मुकाबले ज्यादा तेवर वाले दिखते हैं। यह बदलाव अच्छा साबित होगा या नहीं, यह वक्त बताएगा। पर उनके पास इज्जत दिलाने लायक तजुर्बा है। वे मुंबई इंडियंस की पांचों IPL जीत (2013, 2015, 2017, 2019 और 2020) में टीम का हिस्सा थे। वे अब तक टीम के बैटिंग कोच थे, यानी एक तरह से उन्हें ऊपर के क्रम में भेजा गया है और उनसे नतीजे की उम्मीद है। एक नौजवान IPL फैन का कहना है कि जरूरत पड़ी तो वे खुद बल्ला लेकर उतर सकते हैं और पुराने अंदाज में बड़े शॉट लगा सकते हैं। उम्मीद यही है कि टीम की बल्लेबाजी इतनी न बिगड़े कि पोलार्ड को फिर अपना भरोसेमंद SS बैट उठाना पड़े।
न्यूट्रिशनिस्ट और लाइफस्टाइल कोच विनीता कॉन्ट्रैक्टर ने 40 साल से ऊपर की महिलाओं के लिए छह हफ्ते का ऑनलाइन ग्रुप कोचिंग प्रोग्राम बनाया है, जो 16 नवंबर से शुरू होगा। थकान, ब्रेन फॉग, मूड स्विंग, जोड़ों का दर्द और खराब नींद, चालीस के बाद का दौर महिलाओं के लिए उतार-चढ़ाव भरा हो सकता है, फिर भी इस पर कम ही बात होती है। विनीता खुद इस दौर से गुजरीं और यही इस प्रोग्राम की वजह बना।
कॉन्ट्रैक्टर कहती हैं, \"अपने पेशेवर अनुभव के साथ मैंने खुद भी देखा है कि तनाव या बिना नींद के खुद को खींचने की क्षमता को हमारा दिमाग अब अलग तरह से संभालता है। नींद मेरे लिए अब समझौते की चीज नहीं रही और सही तरह की एक्सरसाइज में नियमित होकर मैं पहले से ज्यादा मजबूत हो गई हूं। मैंने अपने 50वें जन्मदिन का तोहफा खुद को देते हुए एवरेस्ट बेस कैंप ट्रेक किया। अगर आप अपना नजरिया बदलें, तो सेहत को अगले स्तर पर ले जाना बिल्कुल मुमकिन है।\"
\"विब्रेंट हेल्थ सर्कल\" नाम के इस प्रोग्राम में प्लांट-फॉरवर्ड खानपान के फायदे भी बताए जाएंगे। कॉन्ट्रैक्टर जोर देती हैं कि इसका मतलब जरूरी नहीं कि वीगन हों। सब्जियां, फल, साबुत अनाज, नट्स, बीज और दालें आंत के माइक्रोबायोम के लिए अच्छी हैं। प्रोग्राम के अंत तक हिस्सा लेने वाली महिलाएं अपने हार्मोन, और 40 के बाद ताकत, मूवमेंट, नींद और तनाव संभालने की भूमिका को बेहतर समझ पाएंगी। ज्यादा जानकारी के लिए Instagram पर @vinitacontractor देखा जा सकता है।
MVIRDC वर्ल्ड ट्रेड सेंटर मुंबई के हाल के महिला सम्मेलन और अवॉर्ड्स में सचमुच बड़े नाम जुटे थे। इस कॉलम के लेखक को भी अवॉर्ड मिला, पर वहां मौजूद महिलाओं को सुनना और उनसे मिलना ज्यादा अच्छा लगा। शिवसेना (एकनाथ शिंदे गुट) की प्रवक्ता सुसीबेन शाह ने बताया कि उनकी पहल प्रियदर्शिनी टैक्सी सर्विस का अब नवी मुंबई एयरपोर्ट पर काउंटर है। समाजसेवी, लेखिका और परोपकारी मंजू लोढ़ा को सुनना भी अच्छा लगा। उन्होंने कहा, \"हर महिला को रोज बाहर निकलने से पहले आईने में देखकर खुद से कहना चाहिए कि वह सबसे खूबसूरत है। फिर लोग पूछें कि कौन सा फेस-पैक लगाती हो, तो वह कह सकती है, आत्मविश्वास का फेस-पैक!\"
बिहार और झारखंड के मगही लोकगीतों, भाषा और उनसे जुड़ी सांस्कृतिक यादों पर बनी डॉक्यूमेंट्री \"चिड़िया के बसेर\" (Chidiya Ke Baser) लोक परंपरा को जीती-जागती सांस्कृतिक विरासत के रूप में देखती है। 2026 में पूरी हुई यह 78 मिनट की फिल्म उन लोगों, अनुभवों और यादों को सामने लाती है, जिनके सहारे मगही लोकगीत आज भी जिंदा हैं। फिल्म इन गीतों को सिर्फ संगीत या मनोरंजन नहीं मानती। वह समझने की कोशिश करती है कि लोकगीत किसी समुदाय की भाषा, यादें, भावनाएं, रिश्ते और सांस्कृतिक पहचान एक पीढ़ी से दूसरी तक कैसे पहुंचाते हैं।
निर्देशक डॉ प्रतीक महंत कहते हैं, \"यह डॉक्यूमेंट्री उन लोकगीतों को सुनने की कोशिश है, जिन्होंने पीढ़ियों से हमारी जिंदगी, यादों और रिश्तों को आकार दिया है। मेरे लिए चिड़िया के बसेर सिर्फ लोकगीतों का रिकॉर्ड नहीं, भाषा, याद और सांस्कृतिक पहचान की कहानी है।\" फिल्म हाल ही में पटना के जागरण फिल्म फेस्टिवल के डॉक्यूमेंट्री शोकेस के लिए चुनी गई है।
लेखिका शुभा मेनन का नया मेमॉयर \"ट्रेटर इन द हाउस\" (वेस्टलैंड) बायपोलर डिसऑर्डर के साथ बड़े होने के अनुभव पर है। वे कहती हैं, \"अपने बायपोलर बचपन और जिंदगी की ये सारी यादें मैंने हमेशा संजोकर रखी थीं, और इन्हें बाहर आना ही था।\" छह साल में तैयार हुई यह किताब उनके मुताबिक \"लिखने में बहुत मुश्किल किताब\" थी। \"जब भी कुछ दिमाग में आता, मैं बस टूट जाती थी।\" पर लिखने से उन्हें अनचाहा सुकून भी मिला। \"मैंने अपनी मां को माफ कर दिया, जो घर की ट्रेटर हैं। बीमार इंसान ट्रेटर नहीं होता, वह खुद बहुत तकलीफ में होता है। बच्चे के तौर पर आप उन्हें वैसा देख सकते हैं, पर बड़े होने पर सोच बदलनी पड़ती है।\"
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