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पीस बॉन्ड भरना गुनाह कबूलना नहीं, शिवसेना (यूबीटी) ने कार्यकर्ताओं का साथ दिया

शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) ने कहा कि दिल्ली में गिरफ्तार युवा कार्यकर्ताओं का शांति का मुचलका भरना न माफी है, न सरेंडर।

पीस बॉन्ड भरना गुनाह कबूलना नहीं, शिवसेना (यूबीटी) ने कार्यकर्ताओं का साथ दिया तस्वीरें सत्यापित नहीं हैं

शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) ने उन युवा कार्यकर्ताओं का बचाव किया है, जिन्होंने नई दिल्ली में प्रदर्शनों के दौरान गिरफ्तार होने के बाद शांति बनाए रखने का मुचलका भरा। पार्टी का कहना है कि ऐसा पीस बॉन्ड भरने का मतलब यह नहीं कि कार्यकर्ताओं ने गुनाह कबूल कर लिया या प्रशासन के सामने हथियार डाल दिए।

पार्टी के मुखपत्र के मंगलवार के संपादकीय में उद्धव ठाकरे की अगुवाई वाली पार्टी ने उन लोगों की आलोचना की, जो रिहाई के लिए मुचलका भरने वाले कार्यकर्ताओं पर उंगली उठा रहे हैं। संपादकीय के मुताबिक, एहतियात के तौर पर की जाने वाली कानूनी कार्रवाई को कमजोरी की निशानी या लोकतांत्रिक अधिकार छोड़ देने का सबूत नहीं माना जाना चाहिए।

यह विवाद तिरंगा आंदोलन के नाम से हुए प्रदर्शनों के बाद उठा, जो नई दिल्ली में जंतर मंतर समेत कई जगहों पर हुए थे। संपादकीय के अनुसार गिरफ्तारी के बाद युवा कार्यकर्ता अभिजीत दिपके, सौरभ दास, आशुतोष रांका और अजिंक्य शिंदे ने शांति का मुचलका भरा।

वहीं कार्यकर्ता नेहा बोरा ने कथित तौर पर ऐसा मुचलका भरने से मना कर दिया और इस व्यवस्था को अदालत में चुनौती दी। संपादकीय में कहा गया है कि दोनों तरफ के अलग-अलग रुख से बहस छिड़ गई कि ऐसे कागज पर दस्तखत करने के कानूनी नतीजे क्या हैं और पुलिस कार्रवाई झेल रहे कार्यकर्ताओं के पास कौन-से रास्ते होते हैं।

संपादकीय में सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज मार्कंडेय काटजू की उस आलोचना का भी जिक्र है, जो उन्होंने मुचलका भरने वाले कार्यकर्ताओं पर की थी। काटजू ने नेहा बोरा के मुचलका न भरने की तारीफ की। शिवसेना (यूबीटी) का तर्क है कि ऐसी आलोचना एहतियाती कार्यवाही की कानूनी प्रकृति और उन हालात को नजरअंदाज करती है, जिनमें कोई कार्यकर्ता मुचलका भरने को राजी हो सकता है।

संपादकीय में लिखा गया, "पीस बॉन्ड पर दस्तखत करना माफी मांगने, सरकार के आगे घुटने टेकने या किसी जुर्म को कबूल करने के बराबर नहीं है। यह सिर्फ शांति बनाए रखने का वादा है। इससे पूरी तरह चुप रहना जरूरी नहीं हो जाता और न ही नागरिकों को कानूनन सार्वजनिक प्रदर्शनों में हिस्सा लेने से रोका जा सकता है।"

संपादकीय ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) का हवाला दिया, जिसने जुलाई 2024 में दंड प्रक्रिया संहिता की जगह ली। बीएनएसएस की धारा 126 उन मामलों में शांति बनाए रखने के लिए जमानत या मुचलके की बात करती है, जहां कार्यकारी मजिस्ट्रेट को लगता है कि शांति भंग होने की आशंका के लिए काफी आधार हैं। इस प्रावधान के तहत एक साल तक की अवधि के लिए बॉन्ड मांगा जा सकता है।

इस कानूनी प्रक्रिया में मजिस्ट्रेट के सामने तय कार्यवाही भी जरूरी होती है। बीएनएसएस की धारा 141 उन मामलों में कैद की बात करती है, जिनमें मांगी गई सिक्योरिटी नहीं दी जाती या बॉन्ड की कुछ शर्तें तोड़ी जाती हैं।

शिवसेना (यूबीटी) ने कहा कि पीस बॉन्ड भरने से संविधान के अनुच्छेद 19 के तहत मिला शांतिपूर्ण ढंग से इकट्ठा होने का अधिकार अपने आप खत्म नहीं हो जाता। पार्टी ने युवा कार्यकर्ताओं से अपील की कि वे कानूनी कार्यवाहियों से डरे बिना जनता के मुद्दे उठाते रहें। साथ ही उसने काटजू समेत वरिष्ठ कानूनी हस्तियों से कहा कि मुश्किल हालात में लिए गए फैसलों की निंदा करने के बजाय नए कार्यकर्ताओं को रास्ता दिखाएं।

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