व्हाट्सऐप पर भेजी आपत्तिजनक फोटो पर भी लगेगा SC/ST एक्ट, नागपुर पीठ का फैसला
बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर पीठ ने कहा कि व्हाट्सऐप पर SC या ST व्यक्ति की आपत्तिजनक फोटो या वीडियो भेजना पब्लिक व्यू के दायरे में आता है। निखिल थेपाले की अग्रिम जमानत याचिका खारिज हुई।
बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर पीठ ने साफ कर दिया है कि व्हाट्सऐप जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म पर SC या ST समुदाय के किसी व्यक्ति की आपत्तिजनक फोटो या वीडियो शेयर करना या आगे फैलाना सार्वजनिक दृश्य यानी पब्लिक व्यू के दायरे में आता है। ऐसे मामलों में SC/ST एक्ट के कड़े प्रावधान लागू होंगे। कोर्ट ने यह बात निखिल थेपाले की अग्रिम जमानत याचिका पर सुनवाई के दौरान कही।
जिन्हें लगता है कि किसी को निजी तौर पर भेजी गई आपत्तिजनक फोटो या वीडियो कानून की पकड़ से बाहर रहती है, उनके लिए यह फैसला एक बड़ा संदेश है।
मामले में आरोपी के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता की धारा 77 (वॉयुरिज्म) और धारा 78 (स्टॉकिंग), IT एक्ट की धारा 66(E) और 67 के साथ SC/ST एक्ट की गंभीर धाराओं में FIR दर्ज की गई थी। FIR 5 नवंबर 2025 को दर्ज हुई थी।
मामले के अनुसार, शिकायत करने वाली महिला SC/ST समुदाय से है। आरोप है कि आरोपी ने उससे जबरन शारीरिक संबंध बनाने और यौन इच्छाएं पूरी करने की मांग की थी। महिला ने इनकार किया तो आरोपी ने कथित तौर पर उसके आपत्तिजनक वीडियो और तस्वीरें बना लीं। इसके बाद आरोप है कि उसने ये तस्वीरें और वीडियो महिला के पति और रिश्तेदारों के व्हाट्सऐप पर भेज दिए।
सुनवाई में आरोपी के वकील ने दलील दी कि व्हाट्सऐप जैसे पर्सनल मैसेजिंग प्लेटफॉर्म पर फोटो या वीडियो भेजना दो लोगों या चुनिंदा लोगों के बीच की बात होती है। उनके मुताबिक इसे पब्लिक व्यू में किया गया काम नहीं माना जा सकता, इसलिए SC/ST एक्ट की धाराएं लागू नहीं होनी चाहिए।
जस्टिस यंशिवराज खोबरागड़े की एकल पीठ ने यह दलील पूरी तरह खारिज कर दी। मामले की सामग्री देखने के बाद कोर्ट ने माना कि मोबाइल से व्हाट्सऐप पर आपत्तिजनक वीडियो और तस्वीरें भेजना सार्वजनिक दृश्य के दायरे में आता है। अदालत का कहना था कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर शेयर करने से सामग्री दूसरे लोगों की नजर में आ जाती है, और इससे SC/ST एक्ट के तहत अपराध के जरूरी तत्व पूरे होते हैं।
अग्रिम जमानत खारिज करने की एक और वजह रही आरोपी का फरार रहना। कोर्ट ने ध्यान दिया कि FIR दर्ज होने के बाद से आरोपी लगातार फरार चल रहा है। इससे पहले विशेष अदालत भी उसकी अग्रिम जमानत की अर्जियां दो बार खारिज कर चुकी थी। जस्टिस खोबरागड़े ने टिप्पणी की कि अपराध दर्ज होने की तारीख से फरार चल रहा आरोपी अग्रिम जमानत का हकदार नहीं है।
इस फैसले से डिजिटल प्लेटफॉर्म पर फैलती आपत्तिजनक सामग्री और सामाजिक उत्पीड़न को लेकर कानून का दायरा और साफ हुआ है। हाल ही में कलकत्ता हाईकोर्ट के जस्टिस उदय कुमार ने भी एक मामले में कहा था कि SC/ST एक्ट में इस्तेमाल हुआ शब्द सार्वजनिक सिर्फ पारंपरिक या भौतिक जगहों तक सीमित नहीं है।
आज के दौर में इंटरनेट और सोशल मीडिया जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म भी इसी दायरे में आते हैं। इसलिए ऑनलाइन किया गया अपमान या उत्पीड़न भी SC/ST एक्ट के तहत अपराध की श्रेणी में आता है।