वरिष्ठ अभिनेत्री और लावणी कलाकार मधु कांबीकर का निधन
मराठी फिल्मों की वरिष्ठ अभिनेत्री और लावणी कलाकार मधु कांबीकर का निधन हो गया।
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मराठी फिल्म इंडस्ट्री की वरिष्ठ अभिनेत्री और लावणी कलाकार मधु कांबीकर का निधन हो गया है। अपने दमदार अभिनय, सहज संवाद अदायगी और लावणी की खास अदाकारी से उन्होंने कई सालों तक दर्शकों के दिलों पर राज किया। फिल्मों में माँ और सास जैसी अलग-अलग भूमिकाएं निभाकर उन्होंने मराठी मनोरंजन जगत में अपनी अलग जगह बनाई थी।
मधु कांबीकर मराठी मनोरंजन जगत का जाना-पहचाना नाम थीं। अभिनय में सहजता और किरदारों में जान डालने की उनकी शैली ने दर्शकों का दिल जीता। 'झपाटलेला', 'डेबू', 'बिनकामाचा नवरा', 'माझा छकुला' और 'एक होता विदूषक' जैसी फिल्मों में उन्होंने अपने अभिनय की छाप छोड़ी।
फिल्मों में उन्होंने अक्सर माँ और सास के किरदार निभाए। इन भूमिकाओं के जरिए उन्होंने पारिवारिक रिश्तों की भावनाओं को पर्दे पर असरदार ढंग से उतारा। अभिनय के साथ लावणी के क्षेत्र में भी उनका अहम योगदान रहा। उनकी नृत्य शैली में मराठी लोककला की खूबसूरती दिखती थी, इसलिए वे सिर्फ अभिनेत्री के तौर पर ही नहीं, बल्कि लावणी कलाकार के रूप में भी पहचानी जाती थीं।
उनकी जिंदगी में 27 नवंबर 2016 का दिन अहम मोड़ लेकर आया। मुंबई के माटुंगा स्थित यशवंत नाट्यमंदिर में 'लावण्य संगीत' कार्यक्रम हुआ था, जिसमें वे करीब 12 साल बाद फिर से नृत्य पेश करने के लिए मंच पर उतरी थीं।
कार्यक्रम के दौरान उन्हें अचानक बेचैनी महसूस होने लगी। तबीयत साथ नहीं दे रही थी, फिर भी उन्होंने जिद के साथ भैरवी की प्रस्तुति पूरी की। इसके बाद मेकअप रूम में उन्हें पक्षाघात का झटका आया। इस घटना का असर उनके दाहिने हाथ पर पड़ा। इसके बाद उनकी सेहत की परेशानियां बढ़ती गईं और उनके कला सफर पर बंदिशें आ गईं।
पक्षाघात के बाद मधु कांबीकर पहले की तरह सक्रिय नहीं रह पाईं। सेहत गिरती गई, इसलिए उन्हें फिल्मों और नृत्य के कार्यक्रमों से दूर रहना पड़ा। अपनी कला के दम पर दर्शकों के दिलों में जगह बनाने वाली कलाकार के लिए यह वक्त निश्चित ही मुश्किल रहा।
उनके लंबे कला सफर की कद्र 2018 में की गई। झी चित्र गौरव पुरस्कार समारोह में उन्हें जीवनगौरव पुरस्कार देने का ऐलान हुआ। सेहत ठीक न होने की वजह से वे समारोह में नहीं पहुंच सकीं। उनकी बहू शीतल जाधव ने उनकी तरफ से यह पुरस्कार लिया।
मधु कांबीकर ने अपने अभिनय से कई किरदारों को जीवंत किया और लावणी के जरिए मराठी लोककला को लोकप्रिय बनाने में भी योगदान दिया। उनके करियर की फिल्में, भूमिकाएं और मंच की प्रस्तुतियां चाहने वालों की यादों में बनी रहेंगी।