मंगलवार, 6 अक्टूबर 2026

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17:41 IST

सुनील तटकरे की नियुक्ति पर शिकायत, हाईकोर्ट ने चुनाव आयोग को चार महीने में फैसले को कहा

मुंबई उच्च न्यायालय की औरंगाबाद खंडपीठ ने राष्ट्रवादी काँग्रेस के प्रदेशाध्यक्ष सुनील तटकरे की नियुक्ति पर दाखिल शिकायत को चार महीने में निपटाने का निर्देश चुनाव आयोग को दिया है।

सुनील तटकरे की नियुक्ति पर शिकायत, हाईकोर्ट ने चुनाव आयोग को चार महीने में फैसले को कहा
एआई से बनाई गई प्रतीकात्मक तस्वीर; यह घटना का वास्तविक फोटो नहीं है | PT24

मुंबई उच्च न्यायालय की औरंगाबाद खंडपीठ ने चुनाव आयोग को निर्देश दिया है कि राष्ट्रवादी काँग्रेस पार्टी के प्रदेशाध्यक्ष सुनील तटकरे की नियुक्ति को लेकर दाखिल शिकायत पर चार महीने के अंदर फैसला ले। यह आदेश न्यायमूर्ति नितीन सूर्यवंशी और न्यायमूर्ति आबासाहेब शिंदे की खंडपीठ के सामने हुई सुनवाई में दिया गया।

यह याचिका जालना जिले के परतूर-मंथा विधानसभा मतदारसंघ के अध्यक्ष भाऊसाहेब गोरे ने वकील राजेंद्र दासाळकर के जरिए दाखिल की थी। याचिका में दावा किया गया है कि तटकरे की नियुक्ति करते वक्त राष्ट्रवादी काँग्रेस पार्टी के संविधान में बताई गई चुनाव प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया।

गोरे ने इस मामले में 8 अगस्त 2026 को केंद्रीय चुनाव आयोग के पास एक विस्तृत शिकायत दी थी। खंडपीठ ने आयोग से पूछा था कि इस शिकायत पर अब तक क्या कार्रवाई हुई है और इसकी रिपोर्ट पेश की जाए।

सुनवाई के दौरान चुनाव आयोग की तरफ से पेश हुए वकील आलोक शर्मा ने कोर्ट को बताया कि आयोग के निर्देश के मुताबिक याचिकाकर्ता की शिकायत पर चार महीने में फैसला लिया जाएगा। इस आश्वासन के बाद खंडपीठ ने ये निर्देश जारी किए और याचिका का निपटारा कर दिया। अब चुनाव आयोग को तय वक्त में शिकायत पर फैसला करना होगा। नियुक्ति की प्रक्रिया को लेकर लगे आरोपों पर आखिरी फैसला आयोग ही लेगा।

गोरे का आरोप है कि 3 जुलाई 2023 को सुनील तटकरे को महाराष्ट्र राष्ट्रवादी काँग्रेस का प्रदेशाध्यक्ष घोषित किया गया, वह पूरी तरह एकतरफा था। उनका दावा है कि पार्टी के संविधान के हिसाब से राज्य समिति के सदस्यों को पारदर्शी और लोकतांत्रिक संगठनात्मक चुनाव प्रक्रिया के जरिए अध्यक्ष चुनना जरूरी है। यानी उनके मुताबिक तटकरे की नियुक्ति किसी चुनाव के बिना की गई।

ये सभी बातें याचिकाकर्ता के आरोप और दावे हैं। इन पर अब चुनाव आयोग को फैसला लेना है, और उसके लिए कोर्ट ने चार महीने का वक्त तय किया है।

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