गुरूवार, 17 सितमबर 2026

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01:34 IST

शिवसेना नाम-चिन्ह विवाद: सुप्रीम कोर्ट में आज शिंदे गुट रखेगा अपना पक्ष

ठाकरे गुट की दलील पूरी होने के बाद अब शिंदे गुट की ओर से नीरज किशन कौल आज सुप्रीम कोर्ट में दलील रखेंगे।

शिवसेना नाम-चिन्ह विवाद: सुप्रीम कोर्ट में आज शिंदे गुट रखेगा अपना पक्ष
एआई से बनाई गई प्रतीकात्मक तस्वीर; यह घटना का वास्तविक फोटो नहीं है | PT24

शिवसेना पार्टी और धनुष्यबाण चिन्ह को लेकर चल रहा मामला आज यानी 15 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट में फिर सुनवाई के लिए आया। यह विवाद अब आखिरी पड़ाव पर पहुंच चुका है। ठाकरे गुट की तरफ से दलील पूरी हो चुकी है, और अब उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे की ओर से नीरज किशन कौल अपनी बात कोर्ट के सामने रखेंगे। दोपहर दो बजे मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, जॉयमाला बागची और वी. मोहन की बेंच के सामने यह सुनवाई होगी।

अब तक हुई सुनवाइयों में दोनों तरफ से कई अहम मुद्दे कोर्ट के सामने रखे जा चुके हैं। शिंदे गुट के वकीलों ने पहले सवाल उठाया था कि बालासाहेब ठाकरे ने पार्टी के लिए जो संविधान बनाया था, उसे उद्धव ठाकरे ने गलत तरीके से क्यों बदला। आज होने वाली सुनवाई में फिर से एकनाथ शिंदे की तरफ से दलील पेश की जाएगी। बताया जा रहा है कि सॉलिसिटर जनरल चुनाव आयोग और बाकी संवैधानिक संस्थाओं का पक्ष रखेंगे, जिसकी वजह से आज की सुनवाई पर राजनीतिक हलकों की नजर टिकी हुई है।

उद्धव ठाकरे की तरफ से यह दलील वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने रखी थी, और उनकी दलील ने शिंदे गुट में भी हलचल मचा दी थी। सिब्बल ने कहा कि सिर्फ विधायकों की संख्या के आधार पर किसी राजनीतिक पार्टी का मालिकाना हक तय नहीं किया जा सकता। पार्टी का संगठनात्मक ढांचा और मूल संविधान ही सबसे अहम है। विधायक दल में जो फूट पड़ी, वह मूल राजनीतिक पार्टी की फूट नहीं मानी जा सकती, यह दलील उन्होंने कोर्ट में दी। उन्होंने विधायक दल और राजनीतिक पार्टी के बीच का फर्क साफ करते हुए इससे जुड़े कुछ पुराने मामलों का हवाला भी दिया।

बालासाहेब ठाकरे के निधन के बाद पार्टी में अचानक कई बदलाव किए गए। 2013 में "पक्षप्रमुख" नाम का पद बनाया गया, और 2018 में पार्टी के संविधान में बदलाव किया गया। शिंदे गुट का आरोप है कि यह सब लोकतांत्रिक तरीके से नहीं किया गया, पार्टी में और नीचे के पदों के लिए कभी चुनाव नहीं कराए गए, और पार्टी का कामकाज एकाधिकारशाही ढंग से चलाया जा रहा था।

शिवसेना पार्टी और चिन्ह के इस विवाद पर सुप्रीम कोर्ट में पिछले एक महीने से आखिरी सुनवाई चल रही है। शिंदे गुट के वकीलों ने सुप्रीम कोर्ट के इस सिद्धांत का हवाला दिया कि कौन-सी राजनीतिक पार्टी असली है, यह तय करते वक्त विधानसभा में विधायकों की संख्या देखना जरूरी होता है, और इसी आधार पर उन्होंने चुनाव आयोग के फैसले का समर्थन किया। वकीलों ने कोर्ट में यह दलील भी दी कि चुनाव आयोग ने विधायकों की संख्या को ध्यान में रखकर ही फैसला दिया था, और उद्धव ठाकरे ने शिवसेना की मूल विचारधारा के खिलाफ पार्टी से गठबंधन किया, जिसकी वजह से पार्टी के भीतर काफी नाराजगी पैदा हुई।

वकीलों ने यह सवाल भी उठाया कि 2013 में बालासाहेब ठाकरे के बाद "शिवसेनाप्रमुख" पद को खत्म कर दिया गया था, तो कार्याध्यक्ष रहते हुए उद्धव ठाकरे ने पार्टी के भीतर चुनाव क्यों नहीं कराए। अब दोनों तरफ के दावे और जवाबी दावे पूरे होने के बाद सबकी नजरें इस पर टिकी हैं कि सुप्रीम कोर्ट इस मामले में आखिर क्या फैसला सुनाता है।

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