बुधवार, 14 अक्टूबर 2026

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20:31 IST

शेयर बाजार पर दबाव: विदेशी बिकवाली, कमजोर रुपया और शंकर शर्मा की निवेश सीख

विदेशी निवेशकों की बिकवाली, रुपये की गिरावट और महंगे कच्चे तेल के बीच वरिष्ठ निवेशक शंकर शर्मा ने बताया कि पोर्टफोलियो बनाते समय किन बातों पर नजर रखनी चाहिए।

शेयर बाजार पर दबाव: विदेशी बिकवाली, कमजोर रुपया और शंकर शर्मा की निवेश सीख तस्वीरें सत्यापित नहीं हैं

साल 2026 भारतीय शेयर बाजार के निवेशकों के लिए कई चुनौतियां लेकर आया है। विदेशी संस्थागत निवेशकों की लगातार बिकवाली, रुपये की गिरती कीमत और कच्चे तेल के बढ़े हुए दाम ने बाजार पर दबाव बना दिया है। वरिष्ठ निवेशक शंकर शर्मा का कहना है कि बाजार की गिरावट समझने के लिए सिर्फ सेंसेक्स और निफ्टी देखना काफी नहीं है।

12 अक्टूबर 2026 को बाजार की शुरुआत तेजी के साथ हुई थी, लेकिन कारोबार के दौरान यह तेजी टिक नहीं पाई और प्रमुख इंडेक्स गिरावट के साथ लाल निशान में आ गए। अक्टूबर महीने के उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों ने भारतीय शेयर बाजार से करीब 44,166 करोड़ रुपये निकाल लिए थे। पूरे 2026 में उनकी बिकवाली 3 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा हो चुकी थी।

इसके पीछे कच्चे तेल के बढ़े दाम, अमेरिका में बॉन्ड पर बढ़ा हुआ यील्ड और डॉलर की मजबूती को मुख्य वजह माना जा रहा है। भारत जैसा देश, जो बड़े पैमाने पर कच्चा तेल आयात करता है, उसके लिए महंगा तेल महंगाई का दबाव बढ़ा सकता है। डॉलर मजबूत होने पर विदेशी निवेशकों को दूसरे बाजारों में पैसा लगाना ज्यादा आकर्षक लग सकता है, जिससे भारतीय बाजार से पूंजी बाहर जाने का दबाव बनता है। फिर भी सिर्फ विदेशी बिकवाली पर ध्यान देना ठीक नहीं, कंपनियों का प्रदर्शन, उनका वैल्यूएशन और निवेशकों की जोखिम लेने की इच्छा भी देखनी पड़ती है।

शंकर शर्मा के मुताबिक भारतीय बाजार की एक बड़ी दिक्कत यह है कि इंडेक्स कुछ चुनिंदा बड़ी कंपनियों पर टिके हुए हैं। सेंसेक्स और निफ्टी में तेजी दिखे, तब भी ज्यादातर कंपनियों का प्रदर्शन कमजोर हो सकता है। इसलिए निवेशकों को मार्केट कैप के हिसाब से बने इंडेक्स के साथ बराबर वजन वाले इंडेक्स भी देखने चाहिए, जिनमें हर कंपनी को लगभग बराबर अहमियत मिलती है। मिडकैप और स्मॉलकैप कंपनियों का हाल देखकर भी अंदाजा लगता है कि तेजी कितनी व्यापक है।

शर्मा ने बाजार की गहराई और लिक्विडिटी पर भी चिंता जताई। खासकर स्मॉलकैप शेयरों में कारोबार कम हो तो जरूरत के वक्त शेयर बेचना मुश्किल हो सकता है। लोअर सर्किट लग जाए तो बिकवाली के सौदे पूरे होने में अड़चन आ सकती है। इसलिए सस्ते या तेजी से भागते शेयर देखकर पैसा लगाने के बजाय खरीद-बिक्री की क्षमता और जोखिम समझना जरूरी है।

रुपये की गिरावट का असर भी दोहरा है। रिटर्न गिनते समय सिर्फ रुपये में मुनाफा देखना काफी नहीं, यह भी देखना होता है कि आगे खर्च किस करेंसी में करना है। जिसे विदेश में पढ़ाई, सफर या किसी और काम के लिए डॉलर या यूरो में खर्च करना है, उसे रुपये में मिले रिटर्न और उस करेंसी के मुकाबले रुपये की कीमत, दोनों को साथ देखना पड़ेगा। 12 अक्टूबर को रिजर्व बैंक के कदमों के बाद रुपये ने डॉलर के मुकाबले कुछ मजबूती दिखाई थी। फिर भी 2026 में उस समय तक रुपया डॉलर के मुकाबले करीब 6.5% गिर चुका था। यानी रुपये में रिटर्न पॉजिटिव हो, तब भी विदेशी करेंसी के खर्च के लिए उसकी कीमत घट सकती है। हालांकि हर निवेशक को विदेशी बाजार में पैसा लगाना ही चाहिए, ऐसा नहीं है। फैसला अपनी जरूरत और जोखिम सहने की क्षमता के हिसाब से होना चाहिए।

एक पॉडकास्ट की चर्चा में शर्मा ने ग्लोबल शेयर बाजारों पर अपनी राय रखी। वे ग्लोबल शेयरों को लेकर पूरी तरह निराश नहीं हैं। लेकिन अमेरिकी बाजार पर उनका नजरिया मंदी वाला है और भारतीय बाजार पर मध्यम स्तर की मंदी वाला। उभरते बाजारों और लैटिन अमेरिका में उन्हें उतनी कमजोरी नहीं दिखती। पोर्टफोलियो की चर्चा में यूरोप, उभरते बाजारों और लैटिन अमेरिका में निवेश बांटने का जिक्र हुआ। अलग-अलग देशों के बाजारों में हिस्सा लेने के लिए ब्लैकरॉक और वैनगार्ड जैसी कंपनियों के एक्सचेंज ट्रेडेड फंड यानी ईटीएफ का इस्तेमाल किया जा सकता है। ईटीएफ से एक ही प्रोडक्ट के जरिए किसी देश या क्षेत्र की कई कंपनियों में निवेश हो जाता है। पर विदेशी निवेश में बाजार के उतार-चढ़ाव के साथ करेंसी में बदलाव, लेनदेन का खर्च, टैक्स और फंड की बनावट भी देखनी चाहिए। कोई भी विदेशी बाजार आगे अच्छा रिटर्न देगा, इसकी गारंटी नहीं होती।

अपने पोर्टफोलियो के बारे में शर्मा ने बताया कि सोने और चांदी का मिलाकर हिस्सा करीब 10% है। डेट यानी कर्ज वाले बॉन्ड या तय आमदनी देने वाले निवेश का हिस्सा भी अहम है, जो चर्चा में कुल पोर्टफोलियो का अंदाजन 15% से 20% बताया गया। इस ढांचे में तीन अलग मकसद दिखते हैं। शेयरों से लंबे समय में पूंजी बढ़ाना, सोने-चांदी जैसी वैकल्पिक संपत्तियों से विविधता लाना और डेट से अपेक्षाकृत स्थिर आमदनी के साथ दूसरे मौकों के लिए कुछ रकम तैयार रखना। फिर भी सोने-चांदी के दाम भी गिर सकते हैं। इसलिए किसी मशहूर निवेशक के पोर्टफोलियो में इन धातुओं का एक हिस्सा है, सिर्फ इस वजह से उतना ही निवेश करना ठीक नहीं। निवेश की अवधि, पैसों की जरूरत, पूरा पोर्टफोलियो और संभावित नुकसान झेलने की क्षमता देखकर ही हिस्सा तय करना चाहिए।

अगले 3 से 5 साल के लिए शर्मा ने भारत में टेक्नोलॉजी सेक्टर पर खास ध्यान दिलाया है। उनके मुताबिक अमेरिका और एशिया के कुछ सफल बाजारों में टेक कंपनियों की बड़ी भूमिका है, जबकि भारतीय प्रमुख इंडेक्स में शुद्ध टेक्नोलॉजी कारोबार का प्रतिनिधित्व सीमित है। इसलिए उन्होंने टेक कंपनियों में, खासकर जो अभी शेयर बाजार में लिस्ट नहीं हुई हैं, निवेश के मौके तलाशने की बात रखी। ऐसी कंपनियां आगे बड़ी बढ़त हासिल कर सकती हैं, पर उनमें जोखिम भी ज्यादा हो सकता है। अनलिस्टेड कंपनियों के शेयरों का वैल्यूएशन करना मुश्किल होता है, उनकी वित्तीय जानकारी, कारोबार की स्थिरता और आगे की बढ़त का गहरा अध्ययन चाहिए, और ऐसे शेयर आसानी से बिक भी न पाएं। शर्मा ने यह संभावना भी रेखांकित की कि कुछ कंपनियां उम्मीद के मुताबिक सफल होने के बजाय पूरी तरह नाकाम हो सकती हैं।

शर्मा की बातों का सार यह है कि निवेश का फैसला सिर्फ सेंसेक्स-निफ्टी की दिशा, किसी देश के बाजार की लोकप्रियता या पिछले रिटर्न देखकर न लिया जाए। तेजी कितनी व्यापक है, शेयरों में लिक्विडिटी कितनी है, रुपये में बदलाव का क्या असर पड़ता है और पोर्टफोलियो में अलग-अलग संपत्तियों का संतुलन कैसा है, इन सबको साथ देखना जरूरी है। गिरावट सिर्फ नुकसान की बात नहीं, अपनी निवेश रणनीति की समीक्षा का मौका भी होती है। लेकिन गिरावट के बीच हड़बड़ी में निवेश बदलना या दूसरे बाजार के संभावित रिटर्न के लालच में बड़ा जोखिम लेना ठीक नहीं है।

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