सरकारी आवासों की जर्जर हालत पर हाई कोर्ट का स्वतः संज्ञान, राज्य सरकार से रिपोर्ट तलब
बॉम्बे हाई कोर्ट ने महाराष्ट्र में सरकारी कर्मचारियों के आवासों की बदहाली पर खुद संज्ञान लेकर जनहित याचिका मानी, कोर्ट मित्र ने प्रश्नावली पेश की।
महाराष्ट्र में सरकारी कर्मचारियों को मिलने वाले सरकारी आवासों की हालत इतनी खराब होती जा रही है कि अब इस पर बॉम्बे हाई कोर्ट को खुद संज्ञान लेना पड़ा है। कोर्ट ने इस मामले को जनहित याचिका के तौर पर दर्ज कर लिया है, वजह है इन आवासों की जर्जर हालत, वहां रहने वालों की सुरक्षा को लेकर बढ़ती चिंता और मरम्मत के काम में बरती जा रही लापरवाही।
सुनवाई के दौरान कोर्ट मित्र यानी एमिकस क्यूरी अधिवक्ता ए. ए. नागुलकर ने एक विस्तृत प्रश्नावली कोर्ट के सामने रखी। उन्होंने कोर्ट से गुजारिश की कि राज्य सरकार और इससे जुड़े सभी विभागों से सरकारी आवासों की मौजूदा स्थिति पर पूरी रिपोर्ट मांगी जाए।
दरअसल सरकारी कॉलोनियों में बुनियादी सुविधाओं की कमी और रखरखाव में लगातार हो रही अनदेखी की वजह से वहां रहने वाले कर्मचारियों और उनके परिवार वालों की जान तक खतरे में पड़ गई है। कई सरकारी बस्तियों में छत का प्लास्टर गिरने, ड्रेनेज लाइन जाम होने और इमारतें ढहने जैसी घटनाएं बार-बार सामने आ रही हैं।
कोर्ट ने निर्माण और स्ट्रक्चरल ऑडिट को लेकर भी सवाल उठाए हैं। पूछा गया है कि इन सरकारी कॉलोनियों का निर्माण कब हुआ था और इनके नियमित स्ट्रक्चरल ऑडिट के लिए क्या समय सीमा तय की गई है। साथ ही यह भी पूछा गया है कि किसी इमारत को रहने लायक नहीं या खतरनाक घोषित करने का अधिकार आखिर किस प्राधिकरण के पास है।
शिकायत निवारण व्यवस्था को लेकर भी कोर्ट ने जवाब मांगे हैं, कर्मचारियों के पास आवास में मरम्मत की शिकायत दर्ज कराने के लिए कौन सी व्यवस्था है और उसे सुलझाने में कितना वक्त लगता है। साथ ही पिछले 10 साल में प्लास्टर गिरने, छत ढहने, शॉर्ट सर्किट या ऐसे ही किसी हादसे में कर्मचारी या आम नागरिक घायल हुए हैं या नहीं, और अभी प्रशासन के पास कितनी शिकायतें पेंडिंग पड़ी हैं।
पुनर्निर्माण को लेकर भी सवाल हैं, किसी इमारत को खतरनाक घोषित करने के बाद उसे खाली कराने और नया निर्माण शुरू होने में आमतौर पर कितना वक्त लगता है। कोर्ट ने निर्देश दिया है कि जो सरकारी इमारतें अभी तोड़े जाने या नए निर्माण के इंतजार में हैं, उन सबकी पूरी लिस्ट और उनकी मंजूरी की मौजूदा स्थिति कोर्ट के सामने पेश की जाए।
बजट को लेकर भी कोर्ट ने साफ जवाब मांगा है, सरकारी आवासों के रखरखाव के लिए हर साल कितना पैसा मंजूर होता है और असल में खर्च कितना होता है। साथ ही यह भी बताना होगा कि सिर्फ बजट न होने की वजह से मरम्मत के कितने प्रस्ताव अटके पड़े हैं।